क्या गांधी परिवार अवसान की ओर बढ़ रहा है?

आज की राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए हमें एक बार इतिहास में जाने की आवश्यकता है. क्या होगा, या क्या नहीं होगा, यह तो बाद की बात है. पहले यह देखते हैं कि इतिहास और साहित्य के झरोखे से हमें क्या सीखने को मिलता है.

यह लेख भाऊ तोरसेकर के भाषण से प्रेरित है. उन्होंने मराठी बौद्धिक जगत से सभी के लिए दिलचस्प विचार लाने का वादा किया था. यही उसी में से एक है. इब्न खलदून इस्लामी इतिहास के एक बड़े व्यक्ति है. वह 14 वीं शताब्दी के इतिहासकार / राजनयिक / अर्थशास्त्री / लेखक थे और ट्यूनीशिया के निवासी थे. वह ट्यूनीशिया के सुल्तानों के साथ-साथ अन्य उत्तरी अफ्रीकी राज्यों में एक महत्वपूर्ण दरबारी बन गये. उन्हें उनकी पुस्तक मुकद्दिमाह/प्रोलेगोमेना के लिए जाना जाता है. उनकी दिलचस्प अवधारणाओं में से एक “असाबियाह” है जो राजवंशों के भाग्य के बारे में बताती है.

‘असाबियाह’ का अर्थ है एक करीबी समूह-एक भाईचारा, जो एक निश्चित विचार / विचारधारा या धर्म से बंधी होती है. इतिहास के माध्यम से देखें तो इस रचना के अनुसार एक नेता उभरता है जो एक साम्राज्य या एक प्रतिष्ठान स्थापित करता है. वहाँ बाबर, शिवाजी महाराज, बाजीराव पेशवा, अंबानी या नेहरू जैसे शासक थे. यह शासक अकेले इन मील के पत्थरों को स्थापित नहीं करते हैं. उनके पास दोस्तों / साथियों का एक समूह है जो इस साम्राज्य के निर्माण में उनके साथ भाग लेते हैं. जो चीज उन्हें एक साथ बांधती है, उसी का नाम है असाबियाह.

बाबर ने खूनी लड़ाई लड़ी और मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी. शिवाजी महाराज ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं और मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी. बाजीराव ने इसका बड़े पैमाने पर विस्तार किया था. इनमें से प्रत्येक ने साम्राज्य को स्थापित करने के लिए संघर्ष किया, लड़ाइयां लड़ी और कड़ी मेहनत की थी. उन्हें करीबी दोस्तों / जनरलों का समर्थन प्राप्त था. शिवाजी महाराज के पास तानाजी, बाजीप्रभु देशपांडे जैसे अत्यंत वफादार जन थे, जिन्हें “हिंदवी स्वराज्य” के विचार और शिवाजी के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया. बाजीराव के पास होल्कर, शिंदे थे जिन्होंने साम्राज्य का निर्माण अपने पक्ष में किया था. वहीं दूसरों ने भी यही कार्य किया था.

असाबियाह में शासकों को बराबरी के बीच रखा गया है. वह कोहली या धोनी की तरह है – वह कप्तान है लेकिन उन्हें खेलना भी है. वह अपने साथियों को बराबर सम्मान देते है. वे उसे समान मानते हैं और वह उनका नेतृत्व करता है क्योंकि वह अधिक सक्षम है और बेहतर प्रदर्शन करके अपने पुरुषार्थ को दिखाता है. नेहरू ने भी इन्हीं राजवंशों की बराबरी की है. पटेल, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, शास्त्री, मोरारजी देसाई और कई अन्य लोग थे. परंतु नेहरू बराबरी की इस रेस में पहली प्राथमिकता में रखे गए हैं.

फिर अगली पीढ़ी आती है – बेटों की. अब बेटों ने पिता को संघर्ष करते हुए और संघर्ष के मध्य रक्तरंजित होते देखा है. वे उसका सम्मान करते हैं और अपने उन सहयोगियों का भी सम्मान करते हैं जो असाबियाह का हिस्सा हैं. संभ्रांत लोगो के बेटे भी अब (ज़ाहिर सी बात है) रईस बन जाते हैं और राजकुमार की सेवा करते हैं. रईसों और राजकुमार के बीच का रिश्ता मूल शासक और उसके दोस्तों के समान नहीं है. रईसों के बेटे राजकुमार पर ज्यादा निर्भर होते हैं. अर्थात रईसों की तुलना में राजकुमार मूल शासक होते थे.

जब तक पोता आता है, तब तक साम्राज्य अच्छी तरह से बसा हुआ होता है और दादाजी के संघर्ष लोक कथाओं का हिस्सा होते हैं. पोते ने सब कुछ भाग्य का हिस्सा मान लिया. उसके लिए यह सारी घटनाएं बहुत सामान्य थी. शायद ‘टेकेन फ़ॉर ग्रांटेड’ की सोच यही है. वह कहता है, “मुझे जाकर लड़ने की क्या ज़रूरत है? हमारे पास इसके लिए सेना है.” मूल संभ्रांत लोगों के पोते और भी बुरे हैं क्योंकि वे शायद लड़ना भी नहीं चाहते. वे और भी अधिक, या यूं कहें कि पूरी तरह से शासक के पोते पर निर्भर हैं. इस हिसाब से यह सब मिलकर एक सच्चे “दरबार” का निर्माण करते हैं, जहां पर केवल षड्यंत्र और राजनीति है. चाहें कितना भी भाग्यशाली हो, वंश कुछ और पीढ़ियों के लिए चल सकता है जैसे मुगलों का चला, लेकिन विनाश के बीज तीसरी पीढ़ी में ही रख दिए गए हैं.

अब इसकी तुलना आज की कांग्रेस से करें. लड़ने वाले कहां गए? दादी और दादाजी की यादें ताजा हो जाती हैं, लेकिन सेनापति, कप्तान, सैनिक केवल राजकुमार पर भरोसा करते हैं, जो खुद सामान्य राजनैतिक सोच नहीं रखता है. भाऊ ने फिल्म “शतरंज के खिलाड़ी” का उद्धरण दिया. शेख और मिर्ज़ा अवध के नवाब के रईसों के वंशज हैं और हमेशा शतरंज खेलते रहे हैं. जब अंग्रेज आक्रमण करते हैं, तो लड़ने के बजाय, वे एक गाँव की ओर भागते हैं और वहाँ शतरंज खेलते हैं. यह आज कांग्रेस की स्थिति है.

वे अभी भी एक या दो चुनाव जीत सकते हैं लेकिन संगठन की स्थिति को आप स्वतः ही देख सकते हैं. वे एक बार प्रमुख शक्ति थे, अब उन्हें गठबंधन के लिए भीख माँगना पड़ रहा है और अपने कार्यकर्ताओं से अधिक टीवी एंकरों पर भरोसा करना पड़ता है जिसके फलस्वरूप वो लगातार हार रहे हैं.

इस हिसाब से इब्न खल्दून सही साबित हुए हैं.

दावात्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक पर सम्पर्क कर सकते हैं.

लेखक मूलतः पुणे से हैं और वर्तमान में लंदन में रहते हैं।