भारत ने अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए एंटी सेटेलाइट मिसाइल तकनीक हासिल कर ली है. यह तकनीक अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के पास थी. बुधवार दोपहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया था कि लो ऑर्बिट में एक लाइव सैटेलाइट को एंटी सेटेलाइट मिसाइल द्वारा मार गिराया गया है. देश के रक्षा वैज्ञानिकों की यह कामयाबी छोटे-छोटे कदमों के साथ तय की गयी एक ऐसी ऊंची छलांग है, जिससे संपूर्ण विश्व आश्चर्यचकित है.
इस परीक्षण के बाद अब एक नया खुलासा सामने आया है. पूर्व डीआरडीओ प्रमुख और नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके सारस्वत ने दावा किया कि भारत ने यह तकनीक 2012 में ही हासिल कर सकता था. लेकिन दुर्भाग्य से हमें यूपीए सरकार से सकारात्मक सहयोग नहीं मिला. इसलिए हम आगे नहीं बढ़ पाए. साथ ही, श्री सारस्वत ने कहा कि डॉ. सतीश रेड्डी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री मोदी के सामने रखा था, उनके अंदर हिम्मत थी, इसलिए उन्होंने इसे मंजूरी दी.
इस बयान के बाद राजनीतिक दलों में खलबली मच गई. आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया. लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा वाकया हुआ जो हास्यास्पद व दुःखद था. डीआरडीओ के पूर्व चीफ के बयान के बाद कांग्रेस की कलई खुलकर सामने आ रही थी जिसका खामियाजा आगामी चुनाव में कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है. इसलिए बड़े मीडिया हाउस के कथित बड़े पत्रकार राजदीप सरदेसाई खुले तौर पर कांग्रेस के बचाव में आ गए.
उनके ही कार्यक्रम में DRDO के पूर्व चीफ ने यह दावा किया कि हम इस अभूतपूर्व उपलब्धि को हासिल कर सकते थे लेकिन तत्कालीन राजनैतिक लोगों में रीढ़ की हड्डी नहीं थी. उनके इस बयान से दो बातें स्पष्ट है. पूर्व में देश के स्वाभिमान के साथ हमारे ही देश के कुछ राजनेताओं ने समझौता किया है. इसके साथ ही भारत को उसकी क्षमताओं से पीछे रखा गया है. इस बीच सरदेसाई जैसे पत्रकार जब खुलकर कांग्रेस पार्टी के बचाव में आ जाते हैं तो सब कुछ बहुत अजीब लगने लगता है. उन्होंने DRDO के पूर्व चीफ द्वारा कांग्रेस पार्टी को डिसग्रेस बोले जाने को अपने शो में बीप कर दिया. एक राजनैतिक पार्टी के लिए इतनी संवेदनशीलता तो गजब ही है. TRP के लिए जहां क्या नहीं दिखाया जाता, वहां एक राजनैतिक पार्टी की आलोचना को पत्रकार सहन नहीं कर पा रहे.
आप किसी विचारधारा से प्रभावित हो सकते हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब आपकी विचारधारा आपके कर्मक्षेत्र को प्रभावित करने लगे और आप सीधे जनता को प्रभावित करने करने की कोशिश करने लगे, तब द्वंद की स्थिति जन्म लेती है. नेहरू और कांग्रेस से बहुत लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन उनकी कमियों को भी स्वीकार करना चाहिए. जब कोई व्यक्ति किसी की गलती बता रहा हो, तो उसके साथ ऐसा करना निंदनीय है. हो सकता है कि आपने अपने दर्शको का ध्यान रखते हुए इसे बीप किया हो, लेकिन आप तब क्या तर्क देंगे जब आपके विभिन्न स्टिंग ऑपरेशन्स में आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल होता है और आप उसको चलने देते हैं. तब तो आप सच्चाई को उसी रूप मे लाना चाहते हैं, जैसी वो है. तो इस मामले में क्या अलग है?
पत्रकार खुले विचारों वाला होता है. वो सवाल पूछे, इससे किसी को कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जब एक राजनैतिक पार्टी की कमियों को छुपाकर पूर्व में की गई गलतियों को तत्कालीन राजनैतिक बिरादरी से नहीं पूछा जाता है तो संदेह के प्रश्नचिन्ह लगते हैं. आखिर देश को इस अभूतपूर्व उपलब्धि से दूर क्यों रखा गया, क्या कारण थे? आज यदि वो कारण इतने प्रासंगिक थे तो आज भारत ने ये उपलब्धि कैसे हासिल कर ली?
इन प्रश्नों के उत्तर आवश्यक हैं. उससे भी आवश्यक है कुछ पत्रकारों का इस उपलब्धि को एक राजनेता तक सीमित कर देना. मोदी में अपने भाषण में ही साफ किया था कि यह वैज्ञानिकों की उपलब्धि है. इसमें राजनैतिक लोगों को घुसाने का कोई तर्क समझ में नहीं आता. यदि वो इसके ज़िम्मेदार हैं, तो आज नरेंद्र मोदी को बधाइयां मिलनी चाहिए कि उनके पास वो रीढ़ की हड्डी थी कि वो ऐसे निर्णय ले पाए. लेकिन दुख इस बात का है कि इस देश के कुछ बुद्धिजीवी देश के चुने हुए प्रधानमंत्री को किसी बात का क्रेडिट देना ही नहीं चाहते हैं. यही इस संघर्ष का कारण है.
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