हमारे लोकतंत्र में कमियां ढ़ूँढ़ने वालों की कोई कमी नहीं क्योंकि आसमान की भले ही एक हद हो पर नैराश्य की कोई सीमा नहीं होती. चुनावी घोषणा पत्रों व चुनाव प्रचार
हमारे लोकतंत्र में कमियां ढ़ूँढ़ने वालों की कोई कमी नहीं क्योंकि आसमान की भले ही एक हद हो पर नैराश्य की कोई सीमा नहीं होती. चुनावी घोषणा पत्रों व चुनाव प्रचार
लोकसभा चुनाव से पहले ही दलबदल की राजनीति शुरू हो चुकी है. इसी कड़ी में आज ओडिशा से बीजू जनता दल (बीजद) के पूर्व सांसद बैजयंत पांडा भारतीय जनता पार्टी
पंथ या विचार की सेवा करना सद्कर्म है, स्वयंसेवा के लिए प्रवृत्त होना पुण्य. पुण्य पथ पर निस्वार्थ प्रवृत्त रहना तो आज के युग की दुर्लभ उपलब्धियों में से एक
प्रियंका गाँधी (यदि वाड्रा कहने में संकोच हो) का राजनीति में पदार्पण पर यह थी एक पोर्टल की ऑनलाइन खबर की टाइटल. प्रियंका गाँधी को कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाते
2019 आम चुनाव का वर्ष है. वैसे तो हर चुनाव ही महत्वपूर्ण होते हैं पर यह चुनाव बहुत ही खास है. देखना दिलचस्प होगा कि 2014 मे मिली जीत को
भाग – 1 से आगे भारतीय समाज की विशेषता है कि यह अपनी परंपरा और संस्कृति से सदैव जुड़ा रहता है. इस जुड़ाव को तोड़ने के लिये एक नयी चाल
राजस्थान में नई सरकार बनी है. ज़ाहिर सी बात है कि कुछ बदलाव अब राज्य में देखा जाएगा. सकारात्मक, या नकारात्मक यह तो समय के गर्भ में छिपा हुआ है.
2014 का महाभारत युद्ध था. सेनाएं तैयार थी. धर्मराज युधिष्ठिर एक दशक पहले ही युद्ध का मैदान छोड़ चुके थे लेकिन उनके प्रिय शिष्य ने अभी तक गुजरात की गद्दी
एग्जिट पोल के बाद ‘लिख ल्यो’ कहकर चौड़े होने वाले ठंडे पड़ चुके थे. उससे पहले उनकी चुनावी भविष्यवाणी के आत्मविश्वास से चुनाव आयोग भी संशय में पड़ जाता था
लोकतंत के काहे कोसीं नेताजी के काहे खोबसीं सिस्टम के हम काहे भकोंसी जब हमहीं बनडमरु बानी हम तs सुतिया भोटर बानी ई हमके पकठाइल कहलन अउर ऊ मेहराइल कहलन