भाग – 1 से आगे
भारतीय समाज की विशेषता है कि यह अपनी परंपरा और संस्कृति से सदैव जुड़ा रहता है. इस जुड़ाव को तोड़ने के लिये एक नयी चाल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जोड़ दी गयी. भारतीय उत्सवों, परंपराओं का मजाक उड़ाया जाने लगा, उन्हें पितृसत्तात्मक बताया गया. उन्हें पर्यावरण विरोधी बताया गया, ताकि उन उत्सवों के प्रति जनमानस में नकारात्मक भाव आये. दूसरी ओर अनेकों प्रकार के मदर्स डे, फादर्स डे, क्रिसमस डे, न्यू इयर डे, ईद और ईस्टर आदि को भारतीय पर्वों से अधिक उल्लास और हर्ष का पर्व बताने पर जोर दिया जाने लगा. इसके लिये जगह जगह कार्यक्रम आयोजन किये जाने लगे. यह विचार धीरे धीरे सामान्य लोगों के दिमाग में जगह बनाने में सफल हुआ. आज अनेकों कार्यालयों में यह पर्व मनाये जाते हैं किंतु नवरात्रि, चैत्र शुक्ला प्रतिपदा, मकर संक्रांति, रक्षाबंधन, तीज, वसंत पंचमी जैसे उत्सवों के लिये शायद ही किसी ऑफिस में कोई कार्यक्रम का आयोजन किया जाता हो.
इस ईको सिस्टम को समाप्त करने के लिये यह आवश्यक था कि राजनैतिक, प्रशासनिक, शैक्षिक, सामाजिक, मीडिया के क्षेत्र में राष्ट्र भाव रखने वाले व्यक्तियों को लाया जाये. इनमें से जो राजनैतिक, प्रशासनिक और शैक्षणिक क्षेत्र है, उनमे स्थापित व्यक्तियों को हटाये जाने की प्रक्रिया लंबी है, अपने रिटायरमेंट तक वह व्यक्ति सिस्टम में बने रहने का अधिकार रखते हैं. सामाजिक और मीडिया के क्षेत्र के लोग अपने विचार रखने की स्वतंत्रता रखते हैं लेकिन उनकी जीवन रेखा को समाप्त करने का अधिकार राजनैतिक और प्रशासनिक क्षेत्र के लोगों पर है. मीडिया और एनजीओ के क्षेत्र में इस ईको सिस्टम के एकछत्र राज्य में पहले गिरावट आई, और अपनी महत्ता कम होने की छटपटाहट से यह वर्ग नये मीडिया के रूप में सक्रिय हुआ. अनेकों वेबसाइट के माध्यम से अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये यह अभी भी व्याकुल है, लेकिन इसी कशमकश में अपने तंत्र को पुनः संगठित करने में यह काफी हद तक सफल हो रहा है. पहले जो कार्य यह टीवी पर आ कर करता था, अब यह वेबसाइट, यूट्यूबर के चैनल्स, वॉट्सऐप और, टेलीग्राम के मैसेज द्वारा कर रहा है.
2014 का चुनाव के समय इस नये मीडिया पर राष्ट्रभाव रखने वाले व्यक्तियों का प्रभुत्व था, और उन्होंने भारतीय जनमानस को जागरूक करने में इस मीडिया का सदुपयोग सफलतापूर्वक किया. 2019 एक बार फिर सत्ता के चुनने का वर्ष है. जिस ईको सिस्टम की बात ऊपर की गयी वह अपनी पूरी क्षमता के साथ सक्रिय है क्योंकि उसके लिये जीवन मरण का संकट है. यही कारण है कि इस सिस्टम ने इस नये मीडिया में कुछ प्रक्रियायें निर्धारित की हैं. यह झूठ खबरे फैलाता है और इसके लिये तकनीक का उपयोग करता है. फोटोशॉप द्वारा बनाई गयी फोटो, छद्म वेबसाइट पर झूठे समाचार छापे जाते हैं, फिर उन्हें फेसबुक, वॉट्सऐप, टेलीग्राम द्वारा फैलाया जाता है घटनाओं को तोड़मरोड़ कर बेचा जाता है, सलेक्टिव समाचार लिखे जाते हैं. और यह ईको सिस्टम के सभी वर्गों द्वारा किया जाता है.
आतंकी के मरने पर उसके जीवन के दुख को ऐसा दिखाया जाता है मानो उसका आतंकी बनना सर्वथा उचित हो. भारतीय उत्सव जो समाज को उसकी परंपरा से जोड़ते हैं, उसके विरुद्ध यह पूरा तंत्र एक साथ सक्रिय हो जाता है. सामाजिक कार्यकर्ता जागरूकता के नाम पर उस पर्व के अनेकों दोष बताने लगते हैं. अपनी बुद्धिमता के स्थान पर अपने फूहड़पने से सेलेब्रिटी बने लोग ट्वीट करने लगते हैं. अचानक पर्यावरण पर लेख और डेटा प्रस्तुत किया जाने लगता है. लेकिन अन्य धर्मों के उत्सवों पर यही सब लोग हर्ष और उल्लास के साथ अपनी फोटो खिंचाते हैं मानो हिंदू समाज के उत्सव पर्यावरण विरोधी व बाकि सब पर्यावरण हितैषी हों.
2019 का युद्ध देश और समाज के लिये निर्णायक है. यह महाभारत के अंतिम दिनों के युद्ध के जैसा है जब दोनो ओर से सभी प्रकार के उपाय किये जायेंगे. ईको सिस्टम अपनी पूरी क्षमता के साथ पहले से ही सक्रिय हो चुका है, भीमा कोरेगांव से लेकर, आरक्षण आंदोलन तक यह अपनी उपस्थिति को प्रमाणित कर चुका है. कमजोर होने के बाद भी यह अभी समाज में विघटन और संघर्ष कराने की क्षमता रखता है. राज्यों के चुनावों में वोटर की मानसिकता को इसने प्रभावित किया है और विभिन्न प्रकार से बहला फुसला कर वोटर को उसके राष्ट्रीय भाव से दूर रखने में सफल रहा, जिससे सत्ता परिवर्तन हुआ और उसके परिणाम भी सामने आ गये. राज्य फिर पुराने दौर में जाने की ओर अग्रसर है. इन राज्यों में इसी ईको सिस्टम के पुनर्गठन का काम शुरु हो चुका है.
2019 का चुनाव 2024 तक नही, अगले कई दशकों तक के लिये भारत की दिशा और दशा को निर्धारित करेगा. राष्ट्रभाव से हीन समूह अपने सभी हथकंडे अपना रहा है. वह पाकिस्तान तक से सहायता की आशा रखता है. यदि भारतीय जनमानस ने इस अदृश्य ईको सिस्टम को नही समझा, और अपने दायित्व का पालन नही किया तो फिर उसे अपने अगली पीढी को उसी पीड़ा से गुजारना होगा, जिससे उसकी पिछली पीढियां गुजरी थी. भारतीय वोटर चुनाव के पहले बनाये गये वातावरण से प्रभावित होता है, और यह ईको सिस्टम समाज में जाति विद्वेष, भेदभाव, धार्मिक असहिष्णुता के माहौल को बनाने और फिर उसका विज्ञापन करने के लिये प्रयासरत है.
अब यह भारतीय वोटर का दायित्व है कि वह इस ईको सिस्टम की रीढ की हड्डी पर चोट कर फिर से राष्ट्रभाव रखने वाली सत्ता को चुने. और यह चुनाव इसलिये नही कि ईको सिस्टम को तोड़ना है, बल्कि इसके साथ साथ देश और समाज के लिये किये गये कार्यों और प्रयासों को देख कर सत्ता को चुने, मेरी जाति श्रेष्ठ है के स्थान पर मेरा देश आगे बढे के भाव को अपने मन में रखते हुए सभी को आगे बढना होगा. 2019 चुनाव नही बल्कि 800 वर्षों से चले आ रहे उस संघर्ष का पटाक्षेप करके भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में एक और कदम होगा जिसका सपना सदियों से संघर्षरत रही हमारी पीढियों ने देखा है.
