2019 क्यों है देश के लिए निर्णायक

2019 आम चुनाव का वर्ष है. वैसे तो हर चुनाव ही महत्वपूर्ण होते हैं पर यह चुनाव बहुत ही खास है. देखना दिलचस्प होगा कि 2014 मे मिली जीत को भाजपा दोहरा कर भारत की राजनीति मे नया इतिहास रचती है या अपना राजनैतिक अस्तित्व बचाने के लिए बने स्वार्थ पर आधारित बेमेल गठबंधन को सत्ता के ख़ज़ाने की चाबी हाथ लगती है.

आँकड़ो का विश्लेषण किया जाये तो पिछले साढ़े चार वर्षों मे देश की तरक़्क़ी के लिये ताबड़तोड़ काम हुआ है. जनहित मे लागू की गयी योजनाओं से आम जनता को लाभ भी मिला है. फिर भी चुनाव सिर्फ विकास के मुद्दे पर ही नहीं होते. इनमे धारणा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है. कई बार सरकार के अच्छे काम भी बन रही या बना दी गयी धारणा के कारण गौण से दिखने लगते हैं. ऐसी धारणाएं बनाने के लिए विपक्ष नकारात्मक और द्वेषपूर्ण अभियान चलाता है जिसकी बुनियाद झूठी ख़बरों पर टिकी पायी गयी है. आज ऐसी नकारात्मकता खूब देखी जा सकती है.

सोशल मीडिया पर इसकी बानगी देखी जा सकती है. आम लोगों की छोड़िए, पत्रकार तक पक्षकार बन गए लगते हैं. बुद्धिजीवी अपने वैचारिक और पेशेवर कम्फर्ट जोन में सिमटे हुए हैं. सत्ताधारी दल के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. सोशल मीडिया का प्लेटफार्म मुहैया कराने वाले भी सीधे तौर से इस चुनाव को प्रभावित करने मे कूद पड़े है. ट्विटर इंडिया ने एक अभियान  शुरु किया है जिसका निशाना युवा के रुप मे जुड़ने वाले नये वोटर हैं. यह समझ से परे है कि भारतीय मतदान प्रक्रिया में ट्विटर क्यों हस्तक्षेप करता दिख रहा है. इस अभियान के ज़रिये  निराशा का एक माहौल पैदा किया जा रहा है जिससे युवा को मतदान मे या तो NOTA चुनने को प्रेरित करता है या सत्ताधारी दल के विकल्प के रुप मे विपक्षी गठबंधन चुनने को प्रेरित हो सकता है.

इसके विपरीत आप याद करें SRCC (श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स ) में मोदी जी का वो संवाद जिसने युवाओं को नये जोश से भर दिया था. जो युवा नये वोटर है, ज़ाहिर है उन्होंने नब्बे के दशक के पहले का हाल नहीं देखा है या उससे पूरी तरह अवगत नही हैं. इन युवाओं को ऐसी बातें बताना आज आवश्यक है:

1. लाइसेंस परमिट राज – नब्बे के पहले लाइसेंस परमिट राज में कुछ गिने चुने औद्योगिक घरानों के हाथ मे ही उद्योग धंधों का ठेका था. परिणाम स्वरुप उपभोक्ता को कम गुणवत्ता वाले समान महँगे  दामों मे मिलते थे. यह समझ लीजिए कि जो नज़ारा आज घोर आर्थिक असंतुलन वाले देशों का दिखता है, लगभग वैसी ही स्थिति देश मे बन गयी थी. देश का सोना गिरवी रखा जा चुका था. वैश्विकरण और आर्थिक उदारीकरण तत्कालीन सरकार की उपलब्धि नहीं थी बल्कि इसे मजबूरी मे उठाया क़दम ही समझा जाये तो बेहतर है.

2. काले धन का प्रादुर्भाव : तत्कालीन सरकारों की आर्थिक नीतियाँ ऐसी थी जिन्होंने एक आम भारतीय को मजबूर किया कि वो आय का सही विवरण न दे. एक समय तो टैक्स की दर 95 प्रतिशत हो गयी थी. जरा सोचिये, आप अपनी मेहनत से कमाई हुई आय का ९५ प्रतिशत आयकर मे चुका देंगे तो खायेंगे क्या? लिहाज़ा समानांतर अर्थव्यवस्था को बल मिला जहाँ लेन देन अक्सर बेमानी थे. काले धन का जन्म इसी समानांतर अर्थव्यवस्था से हुआ.

3. अभिव्यक्ति की आज़ादी : आज हर बात पर फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का ढिंढोरा पीट कर युवाओं को फुसलाने वाले वही लोग है जिन्होंने देश पर आपातकाल थोपा था. सूचना के अधिकार को देने का दावा करने वालों ने ऐसा माहौल बनाया था कि घर मे रेडियो रखने के लिये भी सरकारी अनुमति लेनी होती थी. आज़ादी के बाद से ही एक परिवार द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने के ऐसे तमाम उदाहरण है जो आप आज कल्पना से परे है.

4. मध्यमवर्गीय जीवन :  सरकारी शिक्षा नीति और आर्थिक नीतियों की वजह से मध्यमवर्गीय युवा कभी ऊँची उड़ान का सपना देख ही नहीं पाता था. उद्देश्य यही होता था कि बस किसी तरह पढ़ाई पूरी कर कोई नौकरी पा लेना. स्वरोज़गार को उत्साहित करने के लिये ना  अवसर थे और ना ही कोई मुद्रा लोन जैसी व्यवस्था. नमक, तेल और लकड़ी के जुगाड़ मे प्रायः हर घर से कोई ना कोई सदस्य या तो राशन की क़तारों मे लगा होता या अतिरिक्त आय के लिये शनिवार, रविवार को भी दफ़्तर मे पड़ा होता था.

5. बिजली सड़क पानी – आज जो 24 घंटे की बिजली,कार-बाइक दौड़ाने को अच्छी सड़कों आदी हो गए हैं, उन्हें याद दिला दूँ कि नब्बे के पहले की छोड़े, पाँच वर्ष पहले भी देश मे बहुत से ऐसे राज्य थे जहाँ बड़े शहरों मे भी बिजली का आना सेलेब्रेशन का कारण होता था.और सड़के यातायात का कम और शारीरिक यातना का पर्याय अधिक थीं.

ये और ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आज हम केवल कल्पना में सोच सकते हैं। पर यदि हम अपने अग्रजों से बात करें तो पाएंगे कि ऐसी चीजें उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं। वर्षों के सुशासन के कारण हम उनके झंझावातों से बाहर निकले हैं। हमको यह याद रखना है कि यह देश किन हाथों बर्बाद हुआ और किन  हाथों में सुरक्षित हैं। सावधान रहें, समझदार रहें।

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