2014 का महाभारत युद्ध था. सेनाएं तैयार थी. धर्मराज युधिष्ठिर एक दशक पहले ही युद्ध का मैदान छोड़ चुके थे लेकिन उनके प्रिय शिष्य ने अभी तक गुजरात की गद्दी छोड़ी नहीं थी. धर्मराज का संसद में कालजयी भाषण हो या उनके नेतृत्व के समय कौरवों के छल और प्रपंच, गुजरात के रण में खड़ा अर्जुन कुछ भी नहीं भूला था. उसको धर्मराज की पीठ पर हुए सैकड़ों छल के आघात याद थे. वह खुद हज़ारों छलों और प्रपंचों के दंश अपने शरीर पर लिए हुए था जो एक तरह से उसे और बलशाली बना चुके थे लेकिन इस समय उसका ध्यान सिर्फ मछली की आँख पर था.
एक दशक के भ्रष्टाचार की कहानी स्वयं हस्तिनापुर के लोगों की ज़बान पर था. धृतराष्ट्र द्वारा दुर्योधन को एकछत्र राज थमा दुःशासन द्वारा हस्तिनापुर में पांचाली का चीरहरण सबने देखा ही था. उसके ऊपर हस्तिनापुर का राजकोष भी खाली पड़ा था जो किसी ज़माने में धर्मराज द्वारा भरकर दिया गया था. विरासत का ऐसा अपमान हस्तिनापुर ने पहले कभी नहीं देखा था. अब चूंकि इस महाभारत का अर्जुन किसी ‘राजवंश’ की संतान नहीं था तो 10 जनपथ में बैठे कौरवों को यह विश्वास हो चला था कि 7 दशकों का बनाया गया ‘इकोसिस्टम’ एक ‘गैर-राजवंशी’ को गद्दी पर बैठने नहीं देगा. यह बस युद्ध के शुरुआती क्षण थे. धर्मराज द्वारा बनाई गई ‘विकास’ की नींव पर भ्रष्टाचार का जो लाक्षागृह एक दशक में खड़ा किया गया, वो सभी हस्तिनापुर वासियों के उस विश्वास को तोड़ता था जो यह कहता था कि हस्तिनापुर से भ्रष्टाचार समाप्त होगा. यह गैर-राजवंशी व्यक्ति बस उसी विश्वास की एक डोर अपने हाथ में थामे हुए था. उसे धर्मराज के अपमान का प्रतिशोध लेना ही था.
युद्ध शुरू हुआ, कौरव 44 योद्धाओं तक सीमित रह गए थे. पांडवों की विजय पताका फिर हस्तिनापुर पर लहरा रही थी. भगवा विजय पताका. हस्तिनापुर का विश्वास अब धरातल पर उतरने ही वाला था परंतु दुर्योधन अब तक मरा नहीं था. याद रखें, यह द्वापर युग का महाभारत नहीं है. यहाँ हर कदम पर एक दुर्योधन खड़ा है. हस्तिनापुर ने जिस विजय को युद्ध की समाप्ति समझा था, असल में वह युद्ध की शुरुआत भर थी. असली युद्ध तो अब लड़ा जाना था. जिस ‘इकोसिस्टम’ की बात 10 जनपद के गलियारों में होती थी, वो अब सामने था. लड़ाई उसी से थी. जिस किले को फतह किया गया था, उसके पहरेदार भी पुरानी राजसत्ता के ही ग़ुलाम थे.
अर्जुन पहले दिन से यह जानता था. परंतु इसके बावजूद वह रणभूमि में उतरा क्योंकि यही उसका धर्म था. बीच युद्धभूमि में वह गांडीव नहीं छोड़ सकता था क्योंकि उसके पास कोई देवकीनन्दन नहीं थे. रणभूमि में वो अकेला खड़ा था. लड़ने के अलावा कोई चारा भी नहीं था. उसकी कमान में एकमात्र ब्रम्हास्त्र ‘विश्वास’ का था. कौरवों की सेना के पास ऐसा कोई हथियार बचा नहीं था. जिस एक ब्रम्हास्त्र का इस्तेमाल करके वे इतने साल राज कर चुके थे, वो भी अब कार्य नहीं करने वाला था. अंततः कौरवों की रणनीति बन गयी. उस ‘विश्वास’ नामक ब्रम्हास्त्र को क्षीण करना. पीछे खड़ा इकोसिस्टम तो साथ में था.
खेल शुरू हो गया. हर एक ‘उपलब्धि’ को ‘झूठ’ बताने का खेल. हर बड़े कार्य को ‘ये तो हमारा ही कार्य है’ कहने का खेल. राजनीति की मर्यादा को रसातल पर ले जाने का खेल. हस्तिनापुर के टुकड़े करने वालों संग हाथ मिला राजगद्दी प्राप्त करने का खेल. देशद्रोह का खेल. राक्षसों ने साधु का वेश धारण कर लिया. इसके पश्चात भी वो उस ‘ब्रम्हास्त्र’ की काट नहीं खोज पाए. हस्तिनापुर को बहुत दिनों बाद कोई ईमानदार नेतृत्व मिला था. इतनी जल्दी कैसे जाने देते? मगर कौरवों की सेना हस्तिनापुर के लोगों की अधीरता को दशकों से पहचानती थी. वो यह जानती थी कि इस राज मुकुट के नीचे रह रही जनता बहुत दिनों तक धैर्य की सीमा के अंदर नहीं रहने वाली. बस उसी सीमा रेखा को पार करवाना है और सिंहासन फिर से दुर्योधन को दिलाना है.
4 साल बाद उस सीमा रेखा में दरारें पड़नी शुरू हो गयी. ये दुर्योधन के लिए किसी अवसर से कम न था. उसके पीछे खड़े रहने वाले शकुनियों और दुःशासनों को भी यह पता था कि यदि हस्तिनापुर का सिंहासन कब्जे में आ गया तो इस बार फिर करीब दो दशकों के लिए पांचाली का चीरहरण होने से कोई नहीं रोक सकता. धर्मराज वैसे ही स्वर्ग सिधार चुके हैं. इस युद्ध में कोई देवकीनन्दन है नहीं, तो सिंहासन होगा सिर्फ दुर्योधन का, और राज होगा उनका. इसीलिए 4 साल से शांत बैठा वो इकोसिस्टम ‘एक्टिव’ कर दिया गया. चलचित्रों के माध्यम से राजमुकुट का अपमान, हास्य और व्यंग्य में हस्तिनापुर की बड़ी मुसीबतों का दोषी भी अर्जुन को घोषित कर देना, समाचारों की दुनिया में सब कुछ ‘एजेंडा’ की दरी में लपेट देना, सब शुरू हो चुका है. फिर भी धैर्य की वो रेखा टूट नहीं रही है. जब तक वो वहाँ रहेगी, दुर्योधन का दोबारा सिंहासन प्राप्त करने का सपना मात्र सपना ही रहेगा. अतः पड़ी दरारों को बड़ा करने के लिए झूठे आरोप लगाने शुरू हुए.
न्याय व्यवस्था के चबूतरे पर भले ही उनके आरोप धराशायी हुए मगर राजमुकुट की प्राप्ति के लिए आतुर राजवंश के सिपाहियों ने दुर्योधन की वाहवाही जारी रखी. दूसरी ओर अर्जुन ने अपनी नीति बनानी शुरू कर दी है. आज भी उसके पास वही एकमात्र ब्रम्हास्त्र है जो वो 2014 में ले कर रणभूमि में उतरा था. उसी हथियार को अब कुंद करने के षणयंत्रों से वो अनभिज्ञ नहीं है. 4 साल में एक भी भ्रष्टाचार का दाग उसके दामन पर नहीं है. हस्तिनापुर की सीमाओं की रक्षा कर रहे सिंहों के पंजों को मज़बूत कर उसने पड़ोसी राज्य की ‘ना-पाक’ सेना के भी दांत खट्टे किये हैं. उसके तरकश में अब कई तीर हैं परंतु आज भी वह अकेला खड़ा है क्योंकि उसको पता है कि किले के पहरेदारों में आज भी बहुत से पहरेदार दुर्योधन काल के पोषित गिरगिट हैं.
देखना ये है कि इस लड़ाई का अंतिम अध्याय कौन जीतता है. 2019 में हस्तिनापुर की जनता किस पर विश्वास करती है. दुर्योधन के नेतृत्व वाली कुटिल शकुनियों के गिरोह पर या धर्मराज के दिखाए मार्ग पर अग्रसर अर्जुन पर. इस बार हस्तिनापुर का भाग्य उसके ही हाथ में है. दिनकर की कविता की चार पंक्तियां हैं;
‘क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुए विनत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।’
यही चार पंक्तियां 4.5 साल की कहानी बताती हैं. अब समय है पुरुषार्थ दिखाने का अन्यथा हस्तिनापुर का भाग्य फिर कौरवों के हाथ मे होगा और यह उस भारत का भी अंत होगा जिसके मूल में ‘सनातन’ विराजमान है.
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Pic Credit – isha.sadhguru.org
