2019 का चुनावी बिगुल बज चुका है. योद्धा मैदान में हैं. काफी कुछ ऐसा है जिसको लेकर अटकलें चल रही हैं. अब मीडिया का बाजार होता ही ऐसा है जहां पर बाल की खाल निकाली जाती है. वैसे ये उनका काम भी है. जनता के प्रतिनिधियों से जनता की आवाज़ बनकर तीखे सवाल करने का कार्य मीडिया का ही होता है, लेकिन आज कल पूरी राम कहानी उल्टी चल रही है.
मोदी सरकार के 5 वर्षों के कार्यकाल में सोशल मीडिया की प्रासंगिकता स्थापित हो चुकी है. बसपा सुप्रीमो मायावती का सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर आना इसका प्रबल उदाहरण है कि आज कल चुनाव लोगों के दरवाजों पर ही नहीं, बल्कि उनके मोबाइल स्क्रीन पर जा कर लड़ने पड़ते हैं. ‘जो दिखता है,वो बिकता है’ वाला मूल मंत्र यहां भी कार्य करता है. इन सभी परिस्थितियों के मध्य देश की सबसे पुरानी पार्टी कहाँ खड़ी नज़र आती है?
पिछले माह प्रियंका गांधी का राजनीति में आना भारतीय राजनीति के कुछ ऐतिहासिक क्षणों में से एक (मीडिया का तो यही कहना है) के रूप में देखा जा रहा था. एक तरफ जहां नरेंद्र मोदी जैसा नाम भारतीय राजनीति में स्थापित हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ एक पार्टी ऐसी भी है जो ‘दादी की नाक’ पर चुनाव लड़ रही है. लेकिन इस बीच एक छोटी महाभारत यहाँ भी चल रही है. कलियुग में भी हम महाभारत के अस्तित्व को नकार नहीं सकते हैं.
सोशल मीडिया पर हर पार्टी का एक IT सेल होता है. यह न सिर्फ अपने नेताओं के कार्यों का अपडेट जनता के समक्ष रखता है बल्कि उनकी ‘इमेज मेकओवर’ का भी ज़िम्मेदार होता है. कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक ट्विटर एकाउंट पर राहुल गांधी तो खूब चमचमाते चेहरे के रूप में देखे जा रहे हैं, लेकिन प्रियंका गांधी वाला स्टॉक थोड़ा कम है. वहां पर न तो प्रियंका गांधी की रैलियों का कोई जिक्र है, और न ही उनके किसी भाषण की कोई खबर. यह समझ में आता है कि राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष है, तो उनको वरीयता मिलना स्वाभाविक सी बात है, लेकिन कहीं वो वरीयता कांग्रेस के तथाकथित ट्रम्प कार्ड की हवा तो नहीं निकाल रही है. वहीं देश का मीडिया प्रियंका गांधी को ले कर काफी उत्सुक है.
थोड़ा पीछे चलते हैं. प्रियंका गांधी के आधिकारिक रूप से चुनावों में उतरने से पूर्व मीडिया पर एक खबर चली थी. कहा गया था कि इस बार राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ सकते हैं. रायबरेली वो सीट है जहां से परंपरागत रूप से कांग्रेस अध्यक्ष ही चुनाव लड़ा करते हैं. अमेठी प्रियंका गांधी के खाते में जा सकती है और सोनिया गांधी इस बार लोक सभा का चुनाव नहीं लड़ेंगी. वैसे यह’सूत्रों’ की जानकारी थी. सूत्रों वाली जानकारी का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसकी कोई गारेंटी स्लिप नहीं होती. फिर भी बिना आग के धुआं नहीं उठता है. जब कांग्रेस उम्मीदवारों की पहली सूची आयी तो साफ हो गया कि कांग्रेस के दो सबसे बड़े नाम 2014 में जहां खड़े थे, 2019 में भी वहीं खड़े मिलेंगे. इस बार भी राहुल गांधी स्मृति ईरानी के सामने खड़े होंगे. अमेठी की मिट्टी इस बार कोई दूसरी फसल उगाने के मूड में है.
अब चूंकि प्रियंका राजनीति में आ ही गयी हैं तो रैलियां और पूजा-पाठ वाला दौर शुरू हो चुका है. राहुल गांधी का भी जनेऊ तैयार है. मगर यहां कांग्रेस के अंदर दो फाड़ स्पष्ट नज़र आते हैं. ऐतिहासिक रूप से यह तथ्य स्थापित है कि कांग्रेस का विरोध भी खुद कांग्रेस ने ही किया है. नरम दल-गरम दल से शुरू हुई कहानी आज राहुल-प्रियंका तक पहुंच गई है.
ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही पार्टी के दो बड़े नेता पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करें और पार्टी का IT सेल सिर्फ एक नेता को ही वरीयता दे? वह भी तब जब खुद उस पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा अमेठी की दीवारों पर ‘प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ’ के पोस्टर्स चेंपे गए हो. सांकेतिक रूप से भी एकता का कोई संदेश कांग्रेस की तरफ से नहीं आ रहा है. दूसरी तरफ लुट्येन्स मीडिया ने तो प्रियंका के राजनीति में पदार्पण के बाद जैसे राहुल गांधी को’सौतेला बेटा’ घोषित कर दिया हो. आज भी उनकी जेब में राफेल वाला फ़र्रा रखा हुआ है, लेकिन पुराने प्रोडक्ट की जगह अब नए प्रोडक्ट की तरफ मीडिया का ध्यान ज़्यादा है. उड़ती हुई ख़बरें तो ये भी आ रही हैं कि सोनिया गांधी के पुराने सिपहसालार इस समय प्रियंका के सजदे में झुके हुए हैं. उन्होंने 15 साल के एक्सपेरिमेंट को देख कर यह स्वीकार कर लिया है कि विजय दिलाने के राजनैतिक फ़ॉर्मूले में राहुल गांधी कहीं फिट नहीं बैठ रहे हैं. ऊपर से राहुल का ट्रैक रिकॉर्ड तो लिखित प्रमाण है.
उधर राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के नए नेता खड़े हैं. वो यह समझ चुके हैं कि इस बार दो स्तर पर लड़ाई लड़नी है. राहुल के सिपाहियों को यह पता है कि इस समय कांग्रेस के ही नहीं बल्कि राहुल के भी राजनैतिक अस्तित्व का भी सवाल है. चूंकि राहुल के नाम के पीछे गांधी वाला ठप्पा है तो जाहिर सी बात है कि उनको बचाना अधिक आवश्यक है. ऊपर से वो ‘वारिस’ भी हैं. पारिवारिक पार्टियों का ‘विज़न’ इसीलिए बहुत क्लियर होता है.
इन सबके बीच मोदी जैसा बड़ा नाम सामने खड़ा है. आज की परिस्थितियों में कांग्रेस को लगता है कि उस नाम से लड़ने के लिए इतिहास के नेताओं को लाना पड़ेगा.
‘राजीव गांधी की झलक’ वाला एक्सपेरिमेंट राहुल गांधी के साथ किया जा चुका है. अब ‘दादी की नाक’ वाला एक्सपेरिमेंट चल रहा है. इसके सफल होने की उम्मीदें कांग्रेस को इसलिए भी ज़्यादा हैं क्योंकि उसके पास अब खोने को कुछ बचा नहीं है.
वो खुद यह समझ रही है कि अपने दम पर तो वो सरकार में आ नहीं सकती. राजीव गांधी के बाद ऐसा कोई बहुत संयोग भी नहीं बना जब कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत लिया हो. तो भलाई इसी में है कि एक नई नींव पर भविष्य की इमारत खड़ी की जाए. 44 से उठकर कम से कम 80 तक पहुंचे. पुराने कांग्रेसी नेता बस यही कर रहे हैं. इस बार महाभारत कौरवों के बीच ही है.
