बनारस के चौबेपुर इलाके का छोटा सा तोफापुर गाँव जहाँ कभी पिता श्याम नारायण यादव ने इस आस में अपना खेत गिरवी रख दिया था कि एक दिन बेटा रमेश यादव फौजी बनकर बहन का ब्याह कर देगा. खेत भी छुड़ा लेगा, टीन शेड के घर को पक्का भी बनवा देगा और हम गाँव में लाठी लेकर सीना तानकर चलेंगे कि अरे! बेटवा हमारा सीआरपीएफ में है.
लेकिन आज उसी रमेश यादव के घर में न रोने की आवाजें थम रहीं हैं,न ही हाथों में तिरंगा और मोमबत्ती लेकर आने वाले लोगों का रेला रुक रहा है. गाँव का जर्रा-जर्रा आज आवाक है. आप सोचें कि एक बेटे ने अपने किसान पिता को कहा हो कि बाबूजी होली में आऊंगा, खेत भी छुड़ाऊंगा, बहन का ब्याह भी तय होगा. लेकिन होली के ठीक पहले ही उसके मरने की खबर आ जाए तो सत्तर साल का बाप तो उसी दिन मर जाएगा न?
आज वही हुआ है. शहीद रमेश यादव के अर्धनिर्मित कमरे का कोना-कोना रो रहा है. डेढ़ साल का बेटा आयुष और तीन साल पहले गवना करा के आई पत्नी का दुःख कहने के लिए कौन सा शब्द सही रहेगा, ये मैं समझ नहीं पा रहा. लेकिन ये देखें कि ईश्वर ने इन परिवार वालों के सीने में क्या जज्बा,क्या जिजीविषा दिया है.
कल जब समूचा तोफापुर गाँव रो रहा था. लोग सन्न थे. सांत्वना सांत्वना दी जा रही थी, तभी दूसरी तरफ रमेश के पिता श्यामनारायण यादव एक हाथ से आँसू पोछ रहे थे और दूसरे हाथ से मवेशियों को चारा दे रहे थे ताकि बेजुबान भूखे न रह जाएं.
अब जरा चंदौली आ जाइये. यहाँ का पड़ाव इलाका जहाँ आज आदमी क्या पेड़-पौधे,खेत-सिवान,और गाय-गोरु तक तक रो रहें हैं और आँसुओ से समूचा इलाका स्तब्ध है. वहाँ कल शाम तक शहीद अवधेश यादव की लाश कहाँ है, इसका पता-ठीकाना तक नहीं चल पाया था. सेना के मुख्यालय से खबर आई भी कि बहुत तेजी से खोजने का काम किया जा रहा है लेकिन कल शाम तक कुछ न हुआ.
आज जब सभी सैनिकों को राजकीय सम्मान के साथ शव यात्रा निकल रही होगी, वहीं शहीद अवधेश यादव के घर वाले लाश मिल जाने की प्रार्थना कर रहे होंगे क्योंकि अखबारों में आज भी कोई पुष्ट खबर नहीं है. पता नहीं अवधेश की कैंसर से पीड़ित माँ की दहाड़ कौन सुन पाएगा. पता नहीं उनकी पत्नी शिल्पी को कौन चुप कराएगा. ईश्वर जानें, बेटा-बेटी को कौन समझा पाएगा, पता नहीं. लेकिन ये भी क्या क्या गजब है कि अवधेश के पिता दहाड़ते हुए कहा रहे थे; “पाकिस्तान के घर में घुस के मारो…हम दूसरे बेटे ब्रजेश को भी फौज में भेजेंगे..”
और ये सिर्फ रमेश और अवधेश ही नहीं, आप देश के चौवालीस परिवारों को जरा ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि सबका हाल एक जैसा है. वो चाहें महाराजगंज के पंकज त्रिपाठी हों या देवरिया के विजय कुमार मौर्या या देश का हर वो जवान जो पुलवामा में शहीद हुआ है.
उन सबके घरों में एक ही कॉमन बात है कि न छत ठीक से बना है न ही घर. कोई तीन साल पहले भर्ती हुआ है, कोई डेढ़ साल पहले. सब अपने-अपने घरों की आख़िरी उम्मीद थे. आखिरी चिराग़ जिनको देश के दुश्मनों ने असमय बुझा दिया.
लेकिन इस बात पर गौर करें और गर्व भी और ये भी देखें कि वो चाहें रमेश के किसान पिता हों या अवधेश के किसान पिता या पंकज और विनय के किसान पिता, इनके जज्बे और जिगर के आगे बड़े-बड़े अरबपति भी भिखमंगे हैं. इनके हौसले के आगे बड़े-बड़े शूरवीर भी चित्त हो जाएं.
और आज ये सब देखकर लगता है कि और कुछ हो या न हो इन पिताओं के जज्बे का जिंदा रहना जरूरी है. और कुछ बचे या न बचे इन उम्मीदों और आकांक्षाओं को बचाना जरुरी है
कल पीएम ने कहा है कि हम छोड़ेंगे नहीं, सैनिको को खुली छूट दे दी गई है. सैनिकों के शवों की परिक्रमा करते हुए उनके चेहरे का दुख और संकल्प सब एक साथ दिख रहा था. लेकिन युद्ध और सर्जिकल स्ट्राइक कोई पबजी गेम नहीं है कि क्लीक किये और शुरू हो गए, न ही फेसबुक पोस्ट है कि लिखकर अपडेट कर दिए. एक व्यापक स्ट्रेटजी बनानी पड़ती है. पूरे विश्व मत को अपनी तरफ झुकाना पड़ता है.
हाँ कल से जिस तरह दिन भर देश के तमाम बड़े देशों ने भारत की तरफ से प्रतिक्रिया दी है, खड़े होने का वादा किया है. वो संतोषजनक और उम्मीद जगाने वाला है कि कुछ स्थायी और बड़ा कदम होगा. और नहीं होगा तो इससे ज्यादा बुरा कुछ नहीं होगा क्योंकि एक फौजी मरता है तो एक बार समूचा देश ही नहीं मरता बल्कि मर जातीं हैं उसके साथ एक परिवार की उम्मीदें और उसकी आकांक्षाएँ.
अगर कुछ न हुआ तो रमेश, अवधेश, पंकज और विनय जैसे चौवालीस परिवारों की उम्मीदें टूट जाएगी. इनके पिताओं की हिम्मत हार जाएगी, ये छला हुआ महसूस करेंगे. और फिर आज के बाद लापता बेटे अवधेश की लाश का इंतज़ार कर रहा कोई गरीब बाप ये नही कहेगा; “हम दूसरे बेटे को भी फौज में भेजेंगे.
ईश्वर करें ऐसा कभी न हो!

4 Comments
भाई पढ़ते वक्त आंखों से आंसुओ की धार रुक ही नही रही थी मानो कि यह सब जैसे मेरे परिवार के साथ ही हुआ है
ईश्वर ऐसा समय किसी फौजी के परिवार को न दिखाई
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