सैनिकों के बलिदान का बदला लेना जिंगोइस्म नहीं है बुद्धूजीवियों..

पुलवामा के रक्तपात पर बहुत कुछ बोला और लिखा जा रहा है. हर तरफ से रोष का माहौल है. सामान्य नागरिक से ले कर सेना के जवान तक, सबने मुट्ठी भींच रखी है. देश को जवाब चाहिए. उन वीर हुतात्माओं को न्याय चाहिए. इस न्याय के बीच बहुत से लोगों को अभी भी ‘शांति के कबूतर’ उड़ाने हैं. समझ नहीं आता है कि इस खेल को वो कब तक खेलेंगे. 70 साल से बॉर्डर पार जब भी शांति के कबूतर भेजे गए हैं, पाकिस्तान ने वहां से उनके पर क़तर कर यहां वापस भेज दिया है. 

ये बातें बोल भी कौन रहा है? टीवी और बॉलीवुड इंडस्ट्री के वो लोग जिनके कमरे के AC का टेम्परेचर ज़रा सा ऊपर नीचे हो जाये तो मेक-अप ज़मीन पर टकपने लगता है. ये सभी लोग देश की उस सेना के जवाब को ‘वॉर मोंगरिंग’ बता रहे हैं जो उन दुर्गम इलाकों में भी डंटकर खड़े रहते हैं, जहां इन बुद्धिजीवियों की कलम कांप जाएगी. जहाँ कलम की सीमा खत्म होती है, वहाँ बंदूक की सीमा शुरू होती है.

ज़रा एक बार उस जगह जा कर देखिये. किस प्रकार की दुर्दांत घटना वहां हुई है. इलाके में घुली उस बारूदी हवा को महसूस कीजिये जिसका भयावह दृश्य हमने उन कुछ तस्वीरों में देखा है जिसको देख कर सिहरन हो उठती है. देश के अंदर एक डायरेक्टर को थप्पड़ पड़ जाए तो तमाम बुद्धिजीवियों से लेकर कलाकारों का रोष देखते बनता है. कुछ लोग तो अपना नाम तक बदल लेते हैं कि डायरेक्टर साहब का आशीर्वाद भविष्य में प्राप्त हो जाये. आज वही लोग इस बात को ले कर चिंता में हैं कि कहीं जंग न हो जाये.

एक पत्रकार महोदया का कहना है कि टीवी चैनल पर बैठे कुछ एंकर लोगों को भड़का रहे हैं. सेना को भड़का कर अमन को निशाना बनाया जा रहा है. उनके ट्विटर एकाउंट पर जाएंगे तो पता चलेगा कि मैडम भारत में ही पत्रकारिता करती हैं. इस भयावह घटना के बाद भी अमन की आशा वाली इस जमात को सुनेंगे तो नपुंसकता की बू आएगी. इस पूरी जमात में वो अकेली नहीं हैं. एक बॉलीवुड अदाकारा भी हैं जिन्होंने पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर ओपन लेटर लिखा था. उनका कहना है कि खून का बदला खून नहीं होना चाहिए. एक और पत्रकार हैं. उनका कहना है कि युद्ध शांति नहीं, हिंसा का संदेश देता है. ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको जंग का खतरा नज़र आ रहा है. 

ऐसे ही लोगों के लिए राष्ट्रकवि दिनकर ने अपनी कविता ‘शक्ति और क्षमा’ में कहा है कि – 

‘क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो.

उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित विनीत सरल हो…’ 

क्षमा और शक्ति का संतुलन बनाये रखना बहुत आवश्यक है. भारतीय सेना भी बॉर्डर पर जंग नहीं, बल्कि शांति के लिए खड़ी है. ज़रा सी असुविधा पर देश के सिस्टम और सरकार पर निशाना साधने वाले यह लोग दुर्गम इलाकों के अंदर हर प्रकार के मौसम और अभावों के बीच हमारे देश की सेना के जवान की इच्छाशक्ति को नहीं देख पर रहे हैं. दुनिया भर में शांति का ब्रांड अम्बेसडर सिर्फ भारत नहीं है. अब तो कुछ जिम्मेदारियां पड़ोसी देश भी खुद पर ले. 

‘ब्लीड इंडिया विथ ए थाउजेंड कट्स’ की विचारधारा वाले लोगों से आप क्या बातचीत करेंगे? क्या समझाएंगे उन्हें, जबकि वो खुद एक धार्मिक मसले को लेकर दुनिया के हर कोने को रक्तरंजित कर रहे हैं. जो लोग इसको राजनैतिक मसला समझ रहे हैं, वो फिर शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर ज़मीन में गाड़ कर रखे हुए हैं. वह सच्चाई देखना नहीं चाहते हैं. क्या बताएंगे आप शहीदों के परिवारों को जो अब सिर्फ बदला चाहते हैं. शक्ति होना कोई बुरी बात नहीं, लेकिन आवश्यकता पर उसका उपयोग न करना एक अपराध है. शांति की पहल भारत ने पिछले 70 सालों से खुद की है. वाजपेयी की लाहौर वाली बस ने हमें कारगिल के रूप में सन्देश दिया, हम फिर भी शांति की पताका पकड़े खड़े रहे. मोदी के पाकिस्तान दौरे के बाद पठानकोट में हमला हुआ. हम तब भी शांति की पताका पकड़े खड़े रहे. अब इस घटना के बाद शांति को किनारे रख शक्ति प्रदर्शन की बारी है.

शायद बुद्धिजीवियों की डिक्शनरी में ऐसे शब्द न हो, लेकिन जब देश का एक जवान देश सेवा के लिए तैयार हो रहा होता है तो उसकी डिक्शनरी में ‘रिवेंज’ नाम का शब्द ज़रूर होता है. ये उसकी ‘वॉर मोंगरिंग’ नहीं बल्कि ‘सेल्फ रेस्पेक्ट’ होती है. हमारे देश के इन तथाकथित शांतिदूतों को अपनी कलम तक ही यह लड़ाई रखनी चाहिए. सीमा की लड़ाई लड़ना इस देश का जवान जानता है.

बदला तो होगा, भीषण होगा. यह ‘वॉर-जिनगोइज़्म’ नहीं है, बल्कि ‘रेटेलिएशन’ है. आज़ादी के बाद बंटवारे का जो घाव हमारे तत्कालीन राजनेताओं के निर्णय के बाद हमें मिला था, वो अब एक कैंसर बन चुका है. कैंसर का इलाज सिर्फ ऑपेरशन होता है. सेना जानती है कि कैसे इसका जवाब देना है. अगर आतंक का जवाब देना ‘वॉर जिनगोइज़्म’ है, तो भारत की जनता उसके साथ खड़ी है.