गांधी से कहके हम तो भागे, कदम टिकते नहीं साहब के आगे रंज लीडर को बहुत है मगर हार के बाद कुछ ऐसा ही हुआ महसूस हुआ रिकार्ड तोड़ जुमलों,
गांधी से कहके हम तो भागे, कदम टिकते नहीं साहब के आगे रंज लीडर को बहुत है मगर हार के बाद कुछ ऐसा ही हुआ महसूस हुआ रिकार्ड तोड़ जुमलों,
आज आपको एक कहानी सुनाता हूँ। बहुत पहले जंगल में लोकतंत्र की स्थापना हुई। उसी जंगल में एक खलीलाबाद नाम का उपवन था। उस उपवन में गधों की आबादीचालीस फीसदी
मेढ़कों को तराजू के दो पलड़ों पर रखकर आप भले ही तौल लें पर चुनावी मौसम में माननीयों का लोकतंत्रीय उछल-कूद (मने दलबदल) रोकना लगभग असंभव है. माननीयों के उछल-कूद
हम बनना कुछ और चाहते हैं, बन कुछ और जाते हैं. हम ड्रीम पालते हैं, पैशन को सेलिब्रेट करते हैं पर दाल रोटी के लिए कहीं और ही टँग जाते
पिछले कई दिनों से जीवन कोहरा प्रधान हो गया है. चारों तरफ कोहरा ही कोहरा है. इधर कोहरा, उधर कोहरा. आसमान में कोहरा जमीन पर कोहरा. सड़क पर कोहरा. पगडंडी
टीवी एंकर्स, अखबारों के स्तंभकार व मूर्धन्य ट्विटकार पूरे साल के घटनाक्रम को हमारे सामने ‘गागर में सागर’ टैप परोसकर कैलेंडर से बेहतर यह बता रहे हैं कि नया साल
यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि नयी सरकार बनने के बाद शुरुआती कुछ महीने वह चुनाव में अपनी पार्टी के किए गए वादे पूरे करने में चुस्ती दिखाती दिखती है.
वे दोनों पहली बार नौ नवम्बर को एटीएम के बाहर मिले. चार घण्टे लाइन में रहे लेकिन उनका नम्बर आने से पहले पैसे खत्म हो गये. लड़की खुद से ही
दावात्याग: व्यसन वही है, कल्पना वही है. यथार्थ से वास्ता अब भी नहीं है. (वो भारत खंड -२ से आगे) अगली बैठक जिसमें घनानंद, संग्राम सिंह को उस भारत में
बाबा वर्षों से मजाक मजाक में ऐसा कह रहे थे पर मोदी जी तो दिल पर ले गये. उन्होने ५००-१००० रुपये के नोट रद्द करने की घोषणा कर डाली. अब