छोड़ सियार भाई कुल्हड़ के आसा, तमासा बन जाइब, होइहे निरासा

छोड़ सियार भाई कुल्हड़ के आसा, तमासा बन जाइब, होइहे निरासा…”

भोजपुरिया गीत है. मनोज तिवारी का गाया हुआ. लेकिन हम यहां इन गाने की बात क्यों कर रहे हैं. अभी बताते हैं. उससे पहले थोड़ा आपको देश के राजनीतिक गलियारों से होते हुए बताते हैं कि यह गाना आज हम क्यों गुनगुना रहे हैं. कसम से कह रहे हैं गुरु राजनीति एक बेहद विचित्र चीज़ है. आज की राजनीति तो गजबे है भाई.

दिल्ली तो याद ही होगा आपको. वही दिल्ली जहां 70 में से 67 वाली सरकार का मुख्यमंत्री बैठा है. वही दिल्ली जहां 543 सीटों में 282 का प्रचण्ड बहुमत लाने वाला प्रधानमंत्री बैठा है. वही दिल्ली जहां एक स्वंयम्भू प्रधानमंत्री कैंडिडेट भी बैठा हुआ है. पांच साल वाली राजनीति तो आपने देखी ही होगी. जब नहीं देखी तो भाई अभिये दिखाए देते हैं.

अरविंद केजरीवाल ‘मफलरवाले’ आज कल कांग्रेस से गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. मतलब संविधान बचाने की ज़िम्मेदारी अब उन्हीं के ज़िम्मेदार कंधों पर है. 3 बार मना करने के बाद भी वो अभी दिल्ली में कांग्रेस को मनाने में लगे हुए हैं. कुछ प्रतिक्रिया न आती देख कर भाई साहब अब धमकी भी देने लगे हैं. कहने लगे हैं कि भाजपा को जिताने के प्रयास में कांग्रेस लगी हुई है. अब बस ज़मीन पर लोटना बाकी है. नहीं तो सारे करम कर दिए गए हैं.

इस महागठबन्धन के लिए उस समय एक और बड़ी खबर आई जब दिल्ली में गठबंधन के लिए कांग्रेस के भावी अध्यक्ष और युवराज राहुल गांधी ने एक ट्वीट किया. ट्वीट के सार ये था कि कांग्रेस तो गठबंधन करने के मूड में थी, केजरीवाल ही नहीं चाहते. उस ट्वीट को हमने दो बार पढ़ा. सारा जोड़ घटाना गुणा भाग लगा लिया लेकिन ससुर समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसा क्या दिल्ली में।आफत आ गयी कि दो परस्पर गलाकाटू स्वभाव वाली पार्टिया गठबंधन वाली मजबूरी में जी रही हैं.

छीछालेदर तब मच गया जब केजरीवाल जी का भी जवाब आया कि भाई हमने गठबंधन नहीं रोक रखा, आपने रोक रखा है. लगे हाथ लोकतंत्र बचाने वाला भी लाइन चेंपे जा रहे हैं. पढ़ लीजिये तो खुद ही हँसी आ जाये. अब बात ही ऐसी हो रही है कि आदमी हंसने की जगह और कुछ कर नहीं सकता है. मतलब रोड पर जूतम पैजार ही बाकी है. दिल्ली वालों में 2015 में मस्त एंटरटेनमेंट का इंतज़ाम कर रखा है. उसका आनंद उनको अब मिल रहा है. 

हमारे राजनीतिक दिमाग के हिसाब से हम यही कह सकते हैं कि इस बार ज़मीनी स्तर पर नरेंद्र मोदी ने ज़रूर कुछ ऐसा किया है जिसके कारण बड़े-बड़ों की स्थिति बिगड़ी हुई है. जैसे पानी बताशे वाले की रेड़ी के आगे हलवाई की दुकान खुल जाए. उसके सारे ग्राहक उस हलवाई के यहां चले जाएं तो उस रेहड़ी वाले के हाथ में ठन-ठन गोपाल वाली स्थिति हो जाती है. जो वोटबैंक लेकर चुनाव जीतने का दंभ भरते थे, आज एक दुसरे की गालियां भुलाने को तैयार है, बस मोदी रोको!

प्रजातंत्र में एक नई नवेली पार्टी को ले कर एक वरिष्ठ पार्टी की ऐसी दयनीय स्थिति पहली बार देखी जा रही है. बोलने को तो लोग ये भी बोल दे कि भाई लोकतंत्र को बचाया जा रहा है. इसके लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार है. लेकिन उस ‘कोई भी कुर्बानी’ के अपने टर्म्स एंड कंडीशन्स हैं. मने खेल सज चुका है. बॉलर तैयार है और बैटिंग करने वाले दो बैट्समैन तय नहीं कर पा रहे कि स्ट्राइक कौन लेगा. खैर, 23 तारीख को नामांकन का आखिरी दिन है. देखते जाइये की आखिरी दाव किस पर लगाया जाता है. बाकी एंटरटेनमेंट में कोई कमी नहीं रहने वाली.

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