हिंदुत्व के आन्दोलन से जुड़े संगठनों और उनसे सहानुभूति रखने वाले राजनीतिक दलों पर यह आरोप अक्सर ही लगता है कि जिस वैभवकाल को ये वापस लाने की बात करते हैं, वह दरअसल शोषणकाल है.
आरोप है कि उस काल में बहुजनों का घोर शोषण हुआ था और वह सवर्ण वर्चस्व का काल था. आरोप यह भी लगता है कि स्वर्णकाल या वैभवकाल एक कोड है जिससे सवर्ण जातियां समझ जाती हैं कि उनके ‘अच्छे दिनों’ की बात हो रही है. वामपंथी, पंथविहीन (कांग्रेस) और जातिवादी राजनीति करने वाले ही यह आरोप लगाते रहते हैं जबकि हम देखते हैं कि पिछले 70 वर्ष का इतिहास कुछ और ही कहता है.
सच और झूठ के बारे में हिटलर के प्रचारमंत्री गोएबल्स ने जो कहा था उसे भारत के वामपंथियों ने आत्मसात कर लिया है. धारणा अक्सर सच्चाई पर भारी पड़ती है. इसे ऐसे समझें कि गरीबी हटाने के लिए कुछ किए बिना वामपंथी और समाजवादी गरीबी पर सिर्फ बात करते हैं और उन्हें गरीबपरस्त दल माना जाता है. सच्चाई यह है कि वे गरीबीपरस्त दल हैं.
लगभग सभी इतिहासकारों ने गुप्तवंश के शासनकाल को स्वर्णयुग या वैभवकाल माना है. इसी कालखंड में ज्योतिष विद्या में, गणित में, मूर्तिकला में, चित्रकला में और साहित्य में भारत ने अद्भुत सफलता प्राप्त की. कालिदास, वराहमिहिर, आर्यभट्ट और वात्सयायन जैसे विद्वान इसी कालखंड में थे. शून्य और दशमलव की खोज इसी कालखंड में हुई.
अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम् और कुमारसंभवम् जैसी महानतम रचनाएँ इसी युग में लिखी गई थी. गुप्त साम्राज्य की सीमा पूर्व में ब्रह्मदेश (म्यांमार) और पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत के पार तक जाती थी.
भारत के पश्चिमी सीमा पर आक्रमणकारी हूणों से लड़ते हुए मगध सम्राट स्कन्दगुप्त खुले आकाश में जमीन पर सोते थे. गुप्तवंश के सम्राट स्वयं वैष्णव मत के थे लेकिन उनके शासनकाल में शैव, शाक्त, बौद्ध और जैन मत के लोग भी पूरी स्वतन्त्रता से रहते थे. यह राजनीतिक स्थिरता और चतुर्दिक प्रगति का काल था.
चौथी से छठी शताब्दी के इस परम वैभव कालखंड में भारत का नेतृत्व जिनके हाथों में था, वह आज की भाषा में बहुजन या अति पिछड़ा कहे जाएंगे. वास्तव में भारत का वैभवकाल किसी एक जाति या जातिसमूह का नही, सभी भारतीयों का वैभवकाल था. और भविष्य में भी जब भारत विश्व में उस स्थान को प्राप्त करेगा, जिसका वह अधिकारी है तो वह किसी एक जाति नहीं होगा, सभी भारतीयों का होगा.
स्वतंत्रता के पश्चात् के कालखंड में भारतीय जनसंघ और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ऐसा दल रहा है, जिसने भारत के इतिहास से प्रेरणा और सीख लेकर भारत के भविष्य का खाका पेश किया है. ऐसे में वामपंथी, पंथविहीन और जातिवादी दल जब भारत के वैभवकाल को शोषणकाल बताते हैं तो निशाने पर भारतीय जनता पार्टी ही होती है. जबकि सच्चाई इसके उलट ही है.
1977 के चुनाव के बाद जब प्रधानमंत्री चुनने की बारी आई तो भारतीय जनसंघ के नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने अपनी पूरी ताकत जगजीवन राम के पीछे झोंक दी लेकिन समाजवादियों को किसी भी कीमत पर एक दलित प्रधानमंत्री स्वीकार्य नहीं था.
1980 में भी जब जगजीवन राम के लिए दुबारा मौका आया तब उनके बेटों के अन्तरंग चित्रों को प्रकाशित कर उनका रास्ता रोका गया. इस षड्यंत्र में भी कांग्रेस और समाजवादी बराबर के भागीदार थे.
1989 के बाद के कालखंड में भी हम देखते हैं कि भाजपा ने अपने विस्तार के साथ साथ किस तरह पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जनजाति को सत्ता में न केवल हिस्सेदारी दी बल्कि उन्हें नेतृव में भी जगह दी. रामजन्मभूमि आन्दोलन के लहर पर सवार भाजपा को जब उत्तरप्रदेश में सत्ता मिली तो मुख्यमंत्री पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह बने.
बिहार में तमाम सवर्ण नेताओं को पिछड़ी जाति के सुशील कुमार मोदी, नन्द किशोर यादव और प्रेम कुमार के लिए जगह बनाना पड़ा. झारखंड में नेतृत्व पहले अर्जुन मुंडा के पास रही और अब रघुबर दास के पास है, जबकि मध्यप्रदेश की सत्ता पहले उमा और फिर शिवराज के पास रही.
असम के मुख्यमंत्री जनजातीय समुदाय से हैं तो कर्णाटक की सत्ता भी भाजपा के लिंगायत और वोक्कालिगा नेताओं के पास रही. ये सभी नेता गैर-सवर्ण जातियों या समुदाय से हैं.
इन सबके उपर भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी हैं जो स्वयं ही पिछड़ी जाति के हैं और जिन्हें 12 वर्षों तक गुजरात का मुख्यमंत्री बने रहने और फिर देश के नेतृत्व का अवसर मिला है. इस तरह हम देखते हैं कि सच्चाई इनके विरोधियों की बनाई हुई धारणा से न केवल अलग है बल्कि विपरीत है.
