तेरहवाँ दिन..
षड्यंत्र के माहिर कौरवों ने पुनः चक्रव्यूह की रचना की. कौरवों को रचनात्मकता के नाम पर उन्हें कुछ भी पता था तो वह था षड्यंत्र और चक्रव्यूह की रचना करना. पितामह लाख कहते रह गए कि; यह अनुचित है पुत्र यह अनुचित है, परंतु दुर्योधन ने उनकी एक न सुनी. दुशासन, जयद्रथ और द्रुमसेना पुनः तैयार हुए.
इतिहास अपने आप को दोहराता है, इस सिद्धांत पर चलकर कौरवों ने सबकुछ सोच रखा था; कि अभिमन्यु चक्रव्यूह के छह चरण तो भेद लेगा लेकिन सातवें में मारा जायेगा, कि उसकी मृत्यु का समाचार पाकर अर्जुन दुःखी होंगे, कि कदाचित इस बार इतने दुखी हो जाएँ कि सन्यास लेकर हिमालय चले जाएँ.
अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया और आगे बढ़ता गया. कौरव सेना के योद्धाओं ने उसे छह चरण तक आने दिया. वे इतिहास के दोहराए जाने को लेकर निश्चिन्त थे. परंतु यह क्या? सातवें चरण में पहुँचते ही अभिमन्यु ने युद्ध कला का ऐसा प्रदर्शन किया जिसके लिए कौरव तैयार नहीं थे. अभिमन्यु ने ऐसे-ऐसे अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग किया जिनके बारे में पांडवों तक को भी पता नहीं था कि ऐसे शस्त्र अभिमन्यु के पास थे. वह वीरता के साथ विद्युत गति से आगे बढ़ता चला गया.
युद्ध करते हुए जब वह नौवें चरण में पहुँचा तो उसका सामना दुर्योधन से हुआ जो उसका मार्ग रोके खड़ा था.
दुर्योधन ने देखते ही चकित होकर प्रश्न किया; “तू यहाँ तक कैसे पहुँचा? मुझे तो बताया गया था कि अर्जुन द्वारा चक्रव्यूह भेदने की कहानी जब छठे चरण में पहुँची थी तब सुभद्रा को नींद आ गई थी?”
अभिमन्यु बोला; “ताऊश्री, मेरी माताश्री द्वापरयुग में नींद का शिकार हो गई थी इसलिए उन्होंने कलियुग में नींद न आने की औषधि खाकर पिताश्री से चक्रव्यूह भेदन की कहानी सुनाने का आग्रह किया. अब देखो मैं तुम सब की कैसी दुर्गति करता हूँ. धृतराष्ट्पुत्र ये देखो………,”
दुर्योधन ने ज़ोर से आवाज़ लगाई; जयद्रथ द्रुमसेना..दुशासन..भागो..ये पागल हो गया है…”
