आज रूस से एक अच्छी खबर आई. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस के सर्वोच्च सम्मान से पुरस्कृत किया गया है. इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका और सऊदी अरब से भी ऐसे ही सम्मान प्राप्त हो चुके हैं. लेकिन यहां खास बात उनका सम्मान प्राप्त करना ही नहीं है बल्कि भारत के प्रति दुनिया का बदला हुआ नज़रिया भी है.
आज भी आप देश में विपक्ष को प्रधानमंत्री मोदी की विदेशी यात्राओं पर तंज कसते हुए देखते होंगे लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा कि इन विदेशी यात्राओं से भारत को हासिल क्या हुआ? वैसे यह सवाल विपक्षी भी पूछते हैं जिनको समय समय पर प्रधानमंत्री मोदी संसद में जवाब दे चुके हैं, लेकिन तब वहां पोस्टर्स और बैनर्स सहित मोदी हाय हाय वाली राजनीति चलती थी. खैर, इन सबके बाद भी एक चीज़ ऐसी है जो नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं से भारत को हासिल हुई है. वह है भारत के प्रति दुनिया का सम्मान!
इतने बड़े देशों द्वारा सिर्फ भारत के प्रधानमंत्री का ही सम्मान नहीं किया जा रहा है बल्कि पूरे देश का सम्मान किया जा रहा है. मोदी यही बात भाषणों में भी बोलते हैं कि जब भी दुनिया का कोई राष्ट्राध्यक्ष मुझे देखता है तो वो मोदी को नहीं बल्कि मोदी के पीछे खड़े सवा सौ करोड़ देशवासियों के विश्वास को देखता है. यही बात मोदी ने सिद्ध कर के दिखाई है. यह प्रधानमंत्री के प्रति हमारे तरफ से ‘अति सकात्मक’ विश्लेषण नहीं बल्कि एक सत्य बात है.
सम्मान उसी का होता है जिसकी भुजाओं में बल होता है. यही बात मोदी भी कहते हैं. यही सनातन धर्म की शिक्षा भी है. भारत की भुजाओं में हमेशा से ताकत थी लेकिन भारत पिछले पांच सालों के भीतर 3 सर्जिकल स्ट्राइक सीमा पार कर पाया तो वह सरकार की निर्णय क्षमता के कारण. निर्णायक सरकार ही देश की भुजाओं की ताकत का इस्तेमाल कर सकती है. मोदी को मिला यह सम्मान भारत की नई उभरती ताकत का एक परिचायक है.
अपने विरोधी को निशाना बनाने से पहले शाब्दिक मर्यादाओं और तर्कों का सही समागम करना किसी नेता की सफ़लता का राज़ होता है. अटल बिहारी बाजपेयी इसमें निपुण व्यक्ति थे. मोदी अटल जैसी वाक शैली के धनी भले न हो लेकिन जनता से उनका जुड़ाव अटल से भी बेहतर है. यह विभिन्न चुनावों में समझ आ चुका है. देश के चुने हुए प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को ‘घूमने जा रहे हैं’ बोल देना विपक्ष की सतही राजनीति का द्योतक है. देश में कई ऐसी काम होते हैं जहां देश के प्रतिनिधि यानी पंतप्रधान को देश के लिए प्रतिनिधित्व करने जाना होता है. ऐसी भाषा में उस घटना को संबोधित करना देश का भी अपमान है और जनता का भी. वैसे इन पुरस्कारों से और कोई ईर्ष्यालु बने न बने, हमारा पड़ोसी ज़रूर इसको देख कर कोप भवन में होगा यह तय है.
