भावनाओं में बह रहे संपादक जी को लोपक प्रणाम!

रोज़गार मुक्त राष्ट्रवाद! यह किसी भाजपा विरोधी पार्टी का नारा नहीं है बल्कि ‘दैनिक भास्कर’ का दिया हुआ जजमेंट है. आप सोच रहे होंगे कि अखबार कोई जज तो है नहीं, फिर जजमेंट कैसे दे रहा है. राजनीति में यही होता रहा है.

भारतीय राजनीति पर टिप्पणियां करते हुए मीडिया भी अब न्यायधीश बन चुका है. दैनिक भास्कर के संपादक महोदय वस्तुतः यह भूल गए कि वह एक समाचार पत्र चलाते हैं और निष्पक्षता उनका एक कर्तव्य है.

टीवी चैनलों की भीड़ के बीच में अखबार की स्याही अब कोई नहीं निहारता है. कहने को तो लोग कुछ भी कह दें, लेकिन सच्चाई तो यही है कि अब मीडिया चैनल भी अप्रासंगिक हो चुके हैं. सस्ते इंटरनेट ने अब दर्शकों को इडियट बॉक्स से उठाकर इंटरनेट पर बिठा दिया.

इन सबके बीच में यदि अखबार को मसाला नहीं मिलेगा तो उसको पढ़ेगा कौन. व्हाट्सअप के युग में पत्राचार अब अप्रासंगिक हो चुका है. ठीक वैसे ही डिजिटल युग में अब अखबारों को मसालों के चटखारे लेकर खबरें बनानी पड़ रही हैं. खैर, यदि एकबार हम ध्यान दें तो इन हैडलाइन में हमें बहुत बड़ी गलती दिखेगी. यह गलती मूलतः आजकल सभी सम्पादकों की सोच को दूषित कर चुकी है. यह भयंकर है, खतरनाक है. 

भारतीय जनता पार्टी के संकल्प पत्र पर किसी की भी अपनी व्यक्तिगत राय हो सकती है. संपादक महोदय की भी होगी परंतु.जब आप अखबार छापते हैं तो तराजू बराबरी पर रखते हैं. रोज़गार के सारे आंकड़े सरकार के पास होते हैं. विश्वसनीयता पर एक अखबार भले ही कितने भी दावे कर ले, लेकिन आधिकारिक आंकड़े मंत्रालयों की टेबल पर ही होते है.

भारत मे तो वैसे भी रोज़गार पता लगाने का कोई तरीका नहीं है. इस बीच दैनिक भास्कर की हैडलाइन को हम जजमेंट न कहें तो कौन सी संज्ञा दें.

निश्चित रूप से राष्ट्रवाद बहुत बड़ा मुद्दा है. जब अभिव्यक्ति की आज़ादी तले देश के टुकड़े होने लगे, जब देश के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री कम और साम्प्रदायिक नेता अधिक घोषित किया जाने लगे, लुट्यन्स के दफ्तरों से ऐसे लेख छापे जाने लगे जिससे सेना के शौर्य पर सवाल होने लगे, AFSPA को हटाने की बात मैनिफेस्टो मे दी जाने लगे और पाकिस्तान से भारत की सरकार को गिराने का अनुरोध होने लगे तब राष्ट्रवाद ही एकमात्र हथियार बचता है.

ब्रिटिश हुकूमत गांधी के चरखे से ही नहीं बल्कि नेता जी की हुंकार के कारण भी भागे थे. शक्ति और नम्रता का संतुलन ही राष्ट्र का निर्माण करता है और उसकी सुरक्षा को सुनिश्चित करता है.

इस हैडलाइन में राष्ट्रवाद को जिस नैरो माइंडेड ओपिनियन के रूप में दिखाया गया है, वह सवाल खड़े करता है. रोज़गार एक समस्या है. लेकिन वह धीरे धीरे ही जाएगी.

इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ इनकम का कांसेप्ट लाने के लिए जनसंख्या नियंत्रण करना पहली प्राथमिकता है. लेकिन जब यहां पहले ही घुसपैठियों को भारत में लाने के लिए समर्थन की बात करने वाली पार्टियों को सेक्युलर दिखाए जाने लगे तो यह एक बड़ी दिक्कत का विषय होता है. संपादक महोदय को उस पर भी ध्यान देना चाहिए. भावनाओं में बहने से बेहतर विकल्प यही है.