रोज़गार मुक्त राष्ट्रवाद! यह किसी भाजपा विरोधी पार्टी का नारा नहीं है बल्कि ‘दैनिक भास्कर’ का दिया हुआ जजमेंट है. आप सोच रहे होंगे कि अखबार कोई जज तो है
रोज़गार मुक्त राष्ट्रवाद! यह किसी भाजपा विरोधी पार्टी का नारा नहीं है बल्कि ‘दैनिक भास्कर’ का दिया हुआ जजमेंट है. आप सोच रहे होंगे कि अखबार कोई जज तो है
चुनावी मौसम है भाई साहब. सब कुछ चल रहा है. विज्ञापन का दौर चल रहा है. कांस्पीरेसी थ्योरी की तो इन्तिहा हो गई है. तमाम लेख बता रहे हैं कि
हाशिये पर खड़े बिस्कुट वाले चैनल से क्रांतिकारी पत्रकार की छुट्टी कर दी गई है. इसके बाद से ही फेसबुक और ट्विटर पर क्रांतिकारी श्रेणी के पत्रकार गण पिछले पाँच
किसी भी व्यक्ति* की मृत्यु एक दुखद घटना होती है. पिछले कई वर्षों से मीडिया और सोशल मिडिया पर मौजूद जनता ने असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा को भी पर कर दिया
यदि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है तो पत्रकारिता स्वच्छ जल कहा जाना चाहिए. पत्रकारिता का दायित्व समाज के संघर्ष को प्रदर्शित करना है. पत्रकार राष्ट्र के सरोकार
ऐसा लगता है जैसे हर पार्टी अपने तरीके से एजेंडा सेट करने में लगी हुई है. हमारे उत्तर प्रदेश का टीपू तो ‘नए साल में नया प्रधानमंत्री’ को ही एजेंडा