जातिवाद पर मतदान लोकतंत्र की स्पिरिट के खिलाफ है

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनावी कड़ाही चढ़ चुकी है. चुनावों के मद्देनजर सभी राजनीतिक दल जीत के ‘पकवान’ तलने में जुटे हुए हैं. कुछ पार्टियां अहंकार से भरी हुई बातें कर रही है हैं तो कुछ बिना सिर पैर के वादे कर रही हैं.

प्रत्येक चुनाव में क्षेत्रीय दल हो या राष्ट्रीय दल जातिवाद न करने की बात कहते हुए टिकट बंटवारे में जातीय समीकरण का ध्यान ज़रूर रखते हैं. इतिहास गवाह है कि देश के वोटर्स का बड़ा वर्ग भी जातिवाद के डोरे में उलझकर कई बार वोटिंग कर देता है.

लेकिन वर्तमान राजनीतिक स्थितियों-परिस्थितियों को देखकर लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव की तरह ही इस बार भी अधिकांश सीटों में देश का वोटर जातिवाद के भ्रमजाल को तोड़ने का प्रयास करेगा. यह देश के लिए आवश्यक भी है, क्योंकि देश का संविधान ही यह कहता है देश के नागरिकों के मध्य जाति व संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.

जब हमारे संविधान की मूल भावना ही ऐसी है तो फिर देश के चुनावों के समय ही जातिवाद का हावी होना नाज़ायज नज़र आता है.

जातिवाद के दानव का इस चुनाव में कमज़ोर होने के बड़े कारणों में विकास व राष्ट्रवाद का मुद्दा शामिल है. सत्ता पक्ष स्वयं द्वारा किए गए कार्यों का लगातार उल्लेख कर रहा है, जबकि मुद्दाविहीन विपक्ष के पास रणनीति के नाम पर सिर्फ आरोपों हैं.

लगभग सभी पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणा पत्र जारी कर दिए हैं. विपक्षी दलों के चुनावी घोषणा पत्र देश व उसकी सुरक्षा के प्रति नकारात्मक विचारों को प्रदर्शित करते हैं. साथ ही जातिवाद की नाव में सवार होकर सत्ता प्राप्ति की राह तक रहे हैं. किन्तु राजनीतिक दलों के जातिगत समीकरणों को धता बताते हुए आज का वोटर स्वयं से पहले देश को स्थान देने के मूड में है.

राष्ट्र के मुद्दों पर विरोधी दलों की नीतियों व बयान बाजी ने देश की जनता को दुखी किया है. साथ ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा अपने नेताओं के राष्ट्रविरोधी बयानों पर कोई भी कार्रवाई न करना भी यह सिद्ध करता है कि पार्टी नेतृत्व नेताओं के बयानों का समर्थन करता है.

बदलती चुनावी फिजां ने आमजन के सवाल भी बदलने शुरू कर दिए हैैं. पिछले करीब चार दशक से उठाई जा रही हाईकोर्ट बेंच स्थापना की मांग पर जवाब से पहले जनता धारा-370 व 35A जैसे मसलों पर सभी पार्टियों का नजरिया जान लेना चाहती है.

सेना के हाथ से अफस्पा छीन लेने का जिक्र होते ही आम जनता के चेहरे पर तिलमिलाहट साफ देखी जा सकती है. राष्ट्रद्रोह जैसे कानून में शिथिलता देने के सवाल पर बवाल होने में तनिक देर नहीं लगती.

आम जनता से यदि राष्ट्रवाद पर प्रश्न किया जाए तो उसका मत यही है कि यह इस राष्ट्र के लिए एक सुखद है. लगातार दो चुनावों में जातिवाद के राक्षस को मारने का प्रयास किया गया है. देश की जनता को पता है कि भारत में जातिवाद को अंग्रेजों ने पैदा किया और उन्होंने मराठा शक्ति को मराठा के नाम से पुकारने में लाभ समझा, तो सिक्खों को सिक्ख, जाटों को जाट, गुर्जरों को गुर्जर अर्थात सिर्फ जातियों के रूप में देखने का काम किया.

अंग्रेजी सरकार ने लोगों को राष्ट्र शक्ति के रूप में कभी भी एक होने नहीं दिया. यही कार्य मुस्लिम सुल्तान और बादशाहों ने भी किया. अब भी यदि हम इसी प्रकार जातीय आधार पर बांटकर देखे जाते रहे और हम राष्ट्रवाद के नाम पर एकजुट नहीं हुए तो देश को नीचा दिखाने वाली शक्तियां हम पर शासन करती रहेंगी.

ऐसे लोग जो भारत में रहकर पाकिस्तान के गीत गाते हैं या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भारतीय प्रधानमंत्री से अधिक वरीयता देते हैं, उन लोगों को वोट देने से क्या देश का हितार्थ हो सकता है. बहरहाल पहले चरण के चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है.

यह चुनाव इस देश का संपूर्ण भविष्य निश्चित कर सकता है. अतः प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रहित का विचार करना होगा. हालांकि यहां एक बात स्पष्ट है कि जब तक हमारे देश का पढ़ा लिखा मतदाता जाति से प्रभावित होकर वोट करता रहेगा तब तक भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र होकर भी लोकतंत्र की स्पिरिट को मिस करता रहेगा.