पवित्र गंगा नदी के तट पर आचमन करते हुए प्रियंका गांधी की तस्वीरें इस समय मीडिया में छाई हुई हैं. माँ गंगा के पावन जल की विशेषता यह बताई जाती रही है कि इसके स्पर्श से ही क्षण भर में व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं. प्रियंका ने बस यही संदेश देने की कोशिश की है कि कांग्रेस ‘हिंदू-विरोधी’पार्टी नहीं है. अब दादी की नाक मिलती है तो क्यों न 30 साल पहले वाला फॉर्मूला अपनाया जाए. सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ अग्रसर कांग्रेस के अंदर इस समय वैसे भी ‘प्रियंका नाम केवलम’है.
उत्तर प्रदेश के चुनावों में सवर्ण वोटर साधने उतरी प्रियंका गांधी के मुख से नरेंद्र मोदी के लिए कुछ शब्द निकले, जो बाद में बवाल बन गया. कहा गया कि ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं’. प्रियंका गांधी का चेहरा इंदिरा का संदेश देने वाला प्रचारित किया जा रहा है. भाषण शैली भी वही है, लेकिन इन सबके बीच समय का बहुत अंतर है. आज के दिन सोशल मीडिया की सार्थकता और इसकी आवश्यकता को खुद खांटी राजनीति पर अधिक विश्वास करने वाली मायावती ने भी करीब एक महीना पहले स्वीकार कर लिया है, और उनका ट्विटर एकाउंट इसका प्रमाण है, तो प्रियंका पर भी यह फार्मूला उतना ही सटीक बैठता है.
वैसे प्रियंका का यह बयान उन्होंने खुद दिया है या उनके भाषण लिखने वाले ने बुलवाया है, यह तो हमें नहीं पता, लेकिन इतना अवश्य है कि अब नरेंद्र मोदी के हाथ में एक और हथियार दे दिया गया है. भाषण शैली में मोदी कितने पारंगत हैं, इसको खुद लालू यादव ‘ई मोदिया खाली भाषण का राजा है’ बोलकर पहले ही स्वीकार कर चुके हैं.
मोदी ने खुद को देश का चौकीदार 2014 के चुनावों में घोषित किया था. राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ बोलकर पहले ही मोदी की घोषणा पर कांग्रेसी मुहर लगा दी. अब प्रियंका ने यह बयान दे कर मोदी को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि खाली चेहरा बदल दिया गया है, विचार नहीं. यदि मोदी देश के चौकीदार हैं (जो कांग्रेस स्वीकार कर चुकी है) तो प्रियंका गांधी के बयान के अनुसार इस देश की जनता तो अमीर हुई? मने कुछ गलत बोला तो बताओ? आखिर 2014 में 282 सीटों को मोदी की झोली में डालकर इसी मोदी को जनता ने अपना चौकीदार चुना था. अब यदि कांग्रेस यह सोच रही है कि मोदी इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे,तो फिर इस पार्टी को अत्यंत गंभीर आत्मचिंतन की आवश्यकता है. वैसे भी ‘चौकीदार चोर है’ का उत्तर ‘मैं भी चौकीदार’ से दिया गया है. इसका चाहें कितना भी उपहास उड़ा लें, परंतु सच्चाई विपक्ष को भी पता है कि ये फ्री हिट पकड़ ली गयी है.
मायावती ने पहले ही कांग्रेस को लाल झंडा दिखा दिया है. बबुआ का सन्नाटा बुआ जी को खुली छूट दे ही रहा है. अब ऐसे समय में कांग्रेस के पास अपना स्वाभिमान बचाने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं था. विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि मोदी के लिए जनता में भले ही लहर हो या न हो, लेकिन पुरवइया तो आज भी बह रही है. यही पुरवा हवा विपक्ष की पीठ में दर्द दे रही है. दशकों की राजनीति में वोट बैंक बनाने वाली पार्टियाँ अपना वोट बैंक बचाने के लिए मैदान में है. इस बीच देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बस महागठबंधन की बैसाखियाँ ढूंढ रही है. आतुरता इतनी है कि गोआ के अंदर मनोहर पर्रिकर की मृत्यु के 24 घण्टे का भी इंतज़ार नहीं किया गया और राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया गया. राजनीति से शिष्टाचार की उम्मीद तो खैर जनता के बीच अब रही नहीं, लेकिन अब मानवता के सैद्धांतिक मूल्यों को भी बिसरा दिया गया है. जिस प्रकार का ट्रेंड इस समय चलाया जा रहा है, वह चिंताजनक है.
खैर, देखना यह है कि मोदी अपनी अगली रैली में इसका क्या जवाब देते हैं, लेकिन यह तय है कि भाजपा की तरफ से सेनाध्यक्ष खड़ा है, लेकिन विपक्ष में अभी भी सेनाध्यक्ष की तलाश चल रही है. बिना सेनाध्यक्ष वाली सेना ने कितने युद्ध जीते हैं, इतिहास गवाह है. आप बस इस चुनावी माहौल के चटकारे लीजिये.
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