मैं 1995-96 में अपने इंडस्ट्रियल टूर के दौरान पहली बार मनोहर पर्रिकर जी से मिला था. तब वह पहली बार विधायक बने थे. IITB के एक ही विभाग से होने के नाते वह हमसे मिलने आये थे. यह एक औपचारिक यात्रा से कहीं अधिक थी. इसी यात्रा के दौरान मुझे पहली बार एहसास हुआ कि एक राजनेता ‘कूल’ भी हो सकता है. संयोग ऐसा हुआ कि उनसे मेरी अगली मुलाकात नागपुर में नितिन जी के बेटे की शादी में हुई.
एक सुखद संयोग फिर हुआ जब हम अगले दिन मुंबई जाने के लिए एक ही फ्लाइट में सफर कर रहे थे. उड़ान में देरी हो रही थी तो हम मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग विभाग, प्रोफेसर्स और हॉस्टल के बारे में बात करने लगे. मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब उन्होंने मेरा नंबर लिया और मुझे संपर्क में रहने के लिए कहा. वह तब गोवा विधानसभा में विपक्ष के नेता थे. मैं उनको किसी भी विषय पर पत्र-व्यवहार या टेक्स्ट करता और वह हमेशा उत्तर देते.
एक बार मैंने कुछ विचारों पर उनकी प्रतिक्रिया माँगी तो उन्होंने मुझसे चर्चा के लिए मिलने को कहा. मैं गोवा गया था और हमलोग मेरे होटल में मिलने वाले थे. तभी ऐसा हुआ कि वह किसी प्रतिनिधिमंडल के साथ व्यस्त हो गए. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं गोवा विधानसभा में आ सकता हूँ.
मेरे ड्राइवर को जब पता चला कि मैं मनोहर जी से मिलने जा रहा हूं तो वह उत्साहित होकर मुझे उनकी सादगी और ‘पब्लिक कनेक्ट’ की कहानियां सुनाने लगा. मैंने उसकी बात सामान्य ड्राइवर ज्ञान की तरह समझते हुए अनदेखा कर दिया. जब हम वहाँ पहुँचे, तो वह गेट पर खड़े थे. मैं नीचे उतर गया और हम दोनों ने एक दूसरे की तरफ हाथ लहराए. मेरा ड्राइवर भी उतर गया. मनोहर जी ने तुरंत उससे कोंकणी में पूछा; “तुम कैसे हो उदय?”
मैं आश्चर्यचकित था और मेरा ड्राइवर उदय तो जैसे अभिभूत ही हो गया. मैंने उनके साथ उनके कार्यालय में लगभग 3 घंटे बिताए और इस दौरान उनकी सादगी का मैं कायल हो गया. वार्ता के दौरान उन्होंने स्वयं ही अपने ज़रूरी कागजातों का प्रबंध किया, सावधानी पूर्वक सब कुछ पढ़ा और मुझसे बात करते हुए नोट्स बनाए. ऐसा लग रहा था जैसे वह वर्षों से मेरे निजी गुरु रहे हों जो जीवन, राष्ट्रवाद और राजनीति पर ज्ञान साझा कर रहे हैं.
मुझे लगता है कि मैंने राजनीति के बारे में इतना कुछ नहीं सीखा जो मैंने कुछ घंटों में उस दिन सीखा. हम पणजी में किसी से मिलने वाले थे. मैं स्तब्ध रह गया जब उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके स्कूटर के पीछे अपनी गाड़ी में चल सकता हूँ. यह व्यक्ति कुछ महीनों में फिर से गोवा के सीएम बनने के लिए तैयार थे. मैंने उनकी स्कूटर के पीछे बैठकर यात्रा की और मेरा ड्राइवर उदय गाड़ी लेकर हमारे पीछे चल रहा था.
अगले दिन मैंने अपनी विदाई ली और वापस मुंबई आ गया. हम संपर्क में रहे लेकिन उसके बाद कभी नहीं मिले. 2014 में उनसे मेरा संपर्क टूट गया और शायद इसके लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ. यदि मैं उनसे संपर्क करता त़ो केन्द्रीय मंत्री होते हुए भी वह मुझे रेस्पॉन्ड करते. मनोहर जी ने ही मुझे विश्वास दिलाया कि राजनीतिज्ञ मेधावी, नम्र और ‘कूल’ भी हो सकते हैं.
वे एक आदर्श थे. वह मेरे ही संस्थान से आने वाले एकमात्र राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ भी थे. उनका निधन एक राष्ट्रीय क्षति है, IITB बिरादरी की क्षति है और मेरे लिए एक बहुत बड़ी व्यक्तिगत क्षति है. मैं आपको सदैव याद करूंगा, सर! आप जैसा हुतात्मा ही बैकुंठ का अधिकारी होता है.
भावभीनी श्रद्धांजलि! ॐ शांति:!
