अपनी अद्भुत चित्रकला ‘मधुबनी पेंटिंग’ के लिए विश्वविख्यात मधुबनी पौराणिक कथाओं में भी एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है. मधुबनी को मिथिला संस्कृति का हृदयस्थल माना जाता है. स्वतन्त्रता से पूर्व मधुबनी दरभंगा राज का हिस्सा था.
जाने माने कम्युनिस्ट नेता भोगेन्द्र झा स्वतन्त्रता के पहले से ही इस इलाके में किसानों की लड़ाई दरभंगा राज से लड़ते रहे थे. यही कारण है कि जबतक भोगेन्द्र झा जीवित रहे, मधुबनी की राजनीति इनके आस-पास केंद्रित रही. भोगेन्द्र झा ने 5 बार मधुबनी लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया. मधुबनी के निवर्तमान सांसद भारतीय जनता पार्टी के चौधरी हुकुमदेव नारायण यादव हैं.
सन 2018 में हुकुमदेव नारायण यादव को सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार मिला था. हुकुमदेव ने संसद में अपने चुटीले भाषणों से लोगों को हँसाया भी है और कईबार भावुक भी किया है. गरीबों और पिछड़ों के सवाल पर हुकुमदेव की सक्रियता देखने लायक होती है. हुकुमदेव 4 बार मधुबनी लोकसभा सीट का संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. जबकि एकबार वे सीतामढ़ी लोकसभा सीट से भी सांसद रहे हैं. लेकिन उनकी उम्र अब 80 के करीब है. ऐसे में वे अगला चुनाव लड़ें, इसकी सम्भवना कम ही है.
अपनी शानदार विरासत के बावजूद मधुबनी पिछड़ेपन की शिकार है. नरेंद्र मोदी की सरकार ने मधुबनी पेंटिंग को बढ़ावा देकर मधुबनी को सम्मान दिया है. मधुबनी में अल्पसंख्यकों की आबादी बहुत है. महागठबंधन इस सीट पर किसी मुस्लिम उम्मीदवार को ही मौका देगा. देखना दिलचस्प होगा कि राजग से मधुबनी का प्रतिनिधि कौन होगा. मधुबनी में पिछले दो दशकों से मुकाबले बेहद करीबी होते रहे हैं. इसबार भी मुकाबला करीबी ही रहने वाला है.
