हाशिये पर खड़े बिस्कुट वाले चैनल से क्रांतिकारी पत्रकार की छुट्टी कर दी गई है. इसके बाद से ही फेसबुक और ट्विटर पर क्रांतिकारी श्रेणी के पत्रकार गण पिछले पाँच वर्ष में 377वीं बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या हो जाने का शोक मना रहे हैं. लेकिन सच्चाई कुछ और ही है.
लोपक के सूत्र बताते हैं कि क्रांतिकारी पत्रकार महोदय हाशिये के चैनल को टीआरपी के केंद्र में लाने का दावा कर मोटी सैलरी पर आए थे. खुद तो करोड़ों का पैकेज लिया ही था, साथ मे अपने कामरेड बन्धुओं को भी मोटी सैलरी देकर लाये थे. लेकिन टीआरपी को न आना था और न आई. उल्टे जो दो-चार लोग चैनल देख भी रहे थे, वे भी शाह फैज़लों के इंटरव्यू के नाम पर झूठ फैलाने से नाराज होकर चैनल बदल लिए. सेठ चालाक निकला और उसने समय से इनकी छुट्टी कर दी. इस तरह आम आदमी के सरोकारों से जुड़ी क्रांतिकारी पत्रकारिता शुरू होते ही खत्म हो गई और पत्रकार महोदय एक बार फिर हाथ मलते रहे गए.
यह सब क्रांतिकारी पत्रकार के लिए नया नहीं है. जब एनडीटीवी इंडिया नम्बर दो का चैनल होता था, तो क्रांतिकारी महोदय आज तक से छलांग मारकर एनडीटीवीटी इंडिया में आ गए थे. चैनल लुढ़क कर चौथे नम्बर पर चला गया तो कहीं-न-कहीं क्रांतिकारी पत्रकार ने आज तक में वापसी का रास्ता ढूंढ लिया. अप्रेजल सही नही लगा तो इन्होंने फिर एक नया मुर्गा ढूंढा. इस बार सहाराश्री सुब्रत रॉय का नम्बर था. उन दिनों सहाराश्री का समय खराब नही था. लेकिन उनके चैनल सहारा समय का समय तब भी बेहद खराब था. चैनल को टीआरपी के पायदान पर हाशिये से मुख्यधारा में लाने का वादा कर, मोटे पैकेज पर ये सहारा में आ गए. लेकिन सहारा समय हाशिये पर ही रहा. अंततः पत्रकार महोदय भी हाशिये पर ढकेल दिए गए. इसके बाद इन्होंने जी न्यूज को पकड़ा. कई सालों तक जी के साथ बने रहे लेकिन टीआरपी तालिका में जी न्यूज 7/8 से ऊपर नहीं उठ पाता था.
2014 के लोकसभा चुनावों के पहले क्रांतिकारी पत्रकार एकबार फिर आजतक में लौटे और जी न्यूज की जान छूटी. आज चैनल टीआरपी तालिका में दूसरे-तीसरे नम्बर का चैनल है. आज तक से निकलकर इन्होंने फिर एबीपी न्यूज का रुख किया लेकिन दर्शकों की बेरुखी के कारण इन्हें बिस्किट वाले चैनल का रुख करना पड़ा जिससे अभी-अभी बहरिया दिए गए हैं.
अब सवाल उठता है कि आखिर ये रास्ता जाता कहाँ है. क्या आम आदमी के सरोकार वाली आखिरी पायदान की पत्रकारिता टीवी से खत्म हो जाएगी और कहीं-न-कहीं द वायर के माध्यम से यूट्यूब में रास्ता तलाश करेगी? या फिर पुरानी चुगलियों को भूलकर एनडीटीवी वाले इन्हे 10 बजे दुकान लगाने का मौका देंगे?
अब यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि क्रांति होगी या पत्रकार महोदय हाथ मलते रह जाएंगे.बहरहाल हम आपको इस गाने के साथ छोड़े जाते हैं…
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