पिछले साढ़े चार बरस,जो गये बुरे दिनों को तरस,सुधार लेना अपनी भूल को,और चुन लेना राहुल को। खरबों रुपये के घोटालों को,दामाद, मामा व दलालों को,हर डील पर लटके तालों
पिछले साढ़े चार बरस,जो गये बुरे दिनों को तरस,सुधार लेना अपनी भूल को,और चुन लेना राहुल को। खरबों रुपये के घोटालों को,दामाद, मामा व दलालों को,हर डील पर लटके तालों
मैं फ़्रैंकफ़र्ट एअरपोर्ट पर मक्खन से लबरेज़ प्रेट्ज्ल चबाते हुए, गरमागरम कॉफ़ी सुड़कते हुए रूई की मानिंद गिरती हुई बर्फ़ का नज़ारा ले रहा था कि कानों में आवाज़ पड़ी
साधन संपन्न मगर भोलेभाले लोगों से भरपूर एक आदर्श गाँव था। गाँव वाले इतने सीधे थे कि उन्हें ना तो पंचायत की आवश्यकता थी और ना हीं पंचों की। भोले
पर्यटन कभी ग्रीष्मकालीन छुटियों का पर्याय हुआ करता था. अप्रैल के आस पास से ही कुछ घरेलु पत्रिकाएं पर्यटन विशेषांक निकालने लगती थीं. इन्टरनेट के आगमन के बाद भले ही