भाग 1 से आगे
इससे पहले कि मैं अपनी दसवीं की पढ़ाई पूरी करता, मैंने अपने घर पर ही प्राथमिक (प्राथमिक ट्रेनिंग कैम्प) पूरी कर ली थी. मैं जल्द ही लोकल शाखा (जिसे प्रताप शाखा कहते हैं) की रैंक में पदोन्नत हुआ और सायं सत्र का मुख्य शिक्षक बन गया था.
मैं संपर्क के लिए जगह जगह घूमता ताकि अधिक से अधिक बच्चों को अपने कार्यकाल के दौरान संघ की शिक्षा से जोड़ पाऊं. मैं शुरुआती समय में अपने इस कार्य से खुश नहीं था क्योंकि मुझे लगता था कि मैं लोगों के जीवन में किसी प्रकार का भी बदलाव नहीं ला पा रहा हूँ. मैं इसके पीछे का कारण भी आपको स्पष्ट रूप से इस बताता हूँ.
कर्नाटक के दक्षिण उडुपी ज़िलें को हिंदू बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है. यह मंदिरों और वैदिक ज्ञाताओं के साथ ही संघ के लिए एक ज़मीनी पकड़ वाला इलाका है. यह आश्चर्यजनक बात है कि परंपरागत कांग्रेसी परिवारों से आने वाले लोग भी यहां संघ के स्वयंसेवक हैं.
शुरुआती दिनों में मैं कांग्रेस समर्थकों और भाजपा समर्थकों में अधिक भेद नहीं करता था, जब तक कि वो हिंदू हो. यहां तक कि कांग्रेस से आने वाले हमारे इलाके के MLC भी संघ के कार्यों में धनराशि (सार्वजनिक रूप से नहीं) लगाया करते थे.
आज भी वह ऐसा करते हैं. उदीपि दक्षिण कन्नड़ ज़िलें में एक बेहद मज़बूत बहुमत का आधार माधव ब्राम्हण,गौड़ सारस्वत ब्राम्हण, बिल्लावास, जैन हुआ करते हैं जो यह नहीं जानते हैं कि देश के अन्य भागों में इस्लाम किस प्रकार पैर पसार रहा है. मैं भी इस अज्ञानता का कई सालों तक शिकार था.
जब मैं मुख्य शिक्षक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा था, तब कर्नाटक राज्य में भाजपा की सरकार थी. कोई भी व्यक्ति हिंदुओं पर आक्रमण करने की सोचता भी नहीं था. ईमानदारी से कहूं तो संगठन का कार्य स्तर लगातार नीचे जाता रहा, जब येदयुरप्पा की सरकार कर्नाटक में थी. उस समय बजरंग दल और भाजपा हिंदू और हिंदुत्व का परिचायक बन चुकी थी.
सच्चाई यह है कि आज भी यह पूर्ण सत्य नहीं है. मैं संघ का स्वयंसेवक होने के लिए अपने दोस्तों से बहुत ताने भी खाया करता था. मेरे घर के पड़ोसी मेरे साथ अपने बच्चों को ट्यूशन या परीक्षा का बहाना बनाकर शाखा तक जाने भी नहीं देते थे.
मुझे आज भी याद है कि कैसे उस समय एक चतुर बालक ने मेरे साथ शाखा के कार्यों में सम्मिलित होने से मना कर दिया था क्योंकि उसको ट्यूशन जाना होता था. एक बार मुझे रक्षा बंधन के त्योहार के लिए करकला नगर परिमिति जो कर्नाटक मे स्थान है, वहां के तीन जगहों में एक कार्यक्रम आयोजित करने का अवसर दिया गया.
यहाँ की एक जगह पर तो मैंने मात्र दो लोगों के साथ ही यह कार्यक्रम सम्पन्न किया जबकि इसके पहले हमने घण्टों की मेहनत से लोकल स्वयंसेवकों के साथ संपर्क का कार्य किया था. कोई नहीं आया.
मैं इस मनोबल तोड़ने वाले घटना पर आज भी हँसता हूँ. लेकिन यह बहुत कम समय तक ही चला था. यहां तक कि एक साल बाद जब मैं इंजीनियरिंग में प्रवेश करने वाला था और तब भी मैं अपने आत्मविश्वास को खोता चला गया और मेरे नेतृत्व की क्षमताओं पर सवाल मैंने तब भी किये जब जमीनी कार्यकर्ता था. मैंने अपना कार्यभार दूसरे लड़के को हस्तांतरित कर दिया जो मुझसे भी छोटा था.
क्रमशः …
(अगले भाग में पढ़ें कि कैसे एक मुसलमान ने लेखक को इस्लाम में परिवर्तित करने का प्रयास किया)

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Waiting for next chapter..