जब एक सारस्वत ब्राम्हण को मिली इस्लाम की धमकी (भाग 1)

बात तब की है जब मैं अपने इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में था. मैंने तब अपने आप को यह स्वतंत्रता दी कि मैं आगे क्या करूँ. मेरे परिवार में बहुत से लोगों ने मुझे मना किया था, लेकिन उसे दरकिनार करते हुए मैने अपनी कक्षा में एक मुस्लिम परिचित को मित्र बनाया. जल्द ही मुझे यह पता चल गया कि यह मेरे जीवन में लिया गया बहुत ही ज़्यादा गलत निर्णय था. मैं आज आपको बताता हूँ कि कैसे उसने मुझे इस्लाम में कन्वर्ट करने का प्रयास किया.

मैं एक धर्मपरायण सारस्वत ब्राम्हण परिवार में पैदा हुआ था. नौ साल की उम्र में ही मुझे यज्ञोपवित दे दिया गया. तब मैं आधिकारिक रूप से ब्राम्हण कहलाया. तभी से मेरे बचपन की एक आदत बन गयी थी कि मैं सुबह जल्दी उठकर वंदना करता. इसके साथ मैं गायत्री मंत्र का जाप भी करता था, पूरे 108 बार. इस एक आदत को मैं कभी नहीं छोड़ता था. इसके बाद मैं तुलसी पौधे को पानी दिया करता था. आचमन भी करता था. यह तुलसी का पौधा स्वास्थ्य, समृद्धि और कल्याण का प्रतीक है. प्राणायाम और वंदना के बाद ही मै नाश्ता करता था.  मेरी माँ, मेरे बड़े भाई और मुझे सप्ताह में दो बार घर के अंदर के मंदिर को साफ करने के लिए मनाया करती थी. हमारे बीच होने वाले झगड़े ने हमारी माँ के लिए इस तरह के एक सरल कार्य को एक कठिन परीक्षा बना दिया था. अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि काश, मैं अपनी माता जी की कठिनाइयों के प्रति और संवेदनशील होता. वह एक कामकाजी महिला थीं, जिन्हे घर चलाने के लिए हमारे पिता से कोई समर्थन नहीं मिलता था.

मैं बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का एक गौरवशाली सदस्य भी हूं. मैं इतना पुराना सदस्य हूँ कि मुझे शाखा के पहले दिन के बारे में भी याद नहीं है. बस इसे मेरी शुरुआती आदतों के रूप में याद रखें. यह बस मेरा एक हिस्सा है. बड़े परिवार और संघ की पृष्ठभूमि के कारण हमारा घर संघ के सभी वरिष्ठ प्रचारकों के लिए देश भर में अपनी कठिन यात्राओं के दौरान निवास, विश्राम और जलपान का गंतव्य था. मुझे गर्व का वह दिन याद है जब हमारे घर तत्कालीन सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी पधारे. हमारे घर में ठहरे. मैं बहुत छोटा था, शायद 12-13 वर्ष का लड़का था. उस आयु में श्री सुदर्शनजी ने हमारे घर पर निवास करने की एक कृपा की थी.

मेरे भाई और मुझे यह नहीं पता था कि हमारे घर पर कौन सी विभूति ठहरी हुई है क्योंकि उनके प्रवास के दौरान हमने उनके साथ चॉकलेट और स्कूल की कविताओं पर एक बढ़िया चर्चा की थी. इतने वर्षों बाद हमें आज पता चल रहा है कि हमें उस दिन किस सौभाग्य का अवसर प्राप्त हुआ था.

एक बुद्धिमान और आकर्षक मनुष्य के साथ उस बातचीत पर जब मैं चिंतन करता हूँ तो मुझे लगता है कि देश में ऐसा महान और महत्वपूर्ण व्यक्ति कैसे सूदूर दक्षिण भारत के दो युवा लड़कों के साथ विनम्र चर्चा में सम्मिलित हुआ था. मुझे ऐसा लगता है, जैसे ऐसे गुण ही महान व्यक्तित्व के परिचायक होते हैं. जिस सरलता से उन्होंने हम दो भाइयों के साथ बातचीत की, वह हम दो छोटे उम्र के भाइयों को समझने के लिए काफी था. हम आज भी एक समर्पित कार्यकर्ता है.

क्रमशः …

(लेखक कैसे संघ के कार्यों में सम्मिलित हुए और दैनिक दिक्कतों का सामना किया, यह जानने के लिए पढ़े अगला भाग)