राजनैतिक मर्यादाओं को ताक कर रखकर राजनेता अपने वोट बैंक को कैसे एड्रेस करते हैं यह किसी से छिपा हुआ नहीं है, लेकिन कल जो आज़म खान ने रामपुर की रैली में किया वह देश के लोकतंत्र को एक करारा तमाचा था. आज़म खान का बयान लोकतंत्र और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान को खुली चुनौती थी कि हम तो ऐसे ही चुनाव लड़ेंगे, जो करना हो कर लो!
रामपुर की रैली में भाजपा के टिकट से खड़ी हुई जयाप्रदा के लिए आज़म खान ने ऐसे गंदे शब्दों का प्रयोग किया जिसे लोकतंत्र में बोला भी नहीं जा सकता है. आपकी बौखलाहट समझ में आती है. चुनाव का समय है तो तनिक इनसिक्योरिटी लगी ही रहती है, लेकिन सार्वजनिक सभा में ऐसी शब्दावली का प्रयोग करने वाले आज़म खान बन्द कमरे में कैसी बातें करते होंगे यह कोई भी अब सोच सकता है. राजनैतिक शुचिता को बनाये रखना राजनेताओं का कर्तव्य होता है लेकिन वह शायद अपने अधिकारों के लिए अधिक सजग दिखते हैं. तभी तो EVM का रोना रोया का रहा है.
दूसरी तरफ उसी मंच पर अखिलेश भी थे. उनके मुखड़े का सहज भाव ही आज़म खान को एक मौन स्वीकृति थी. कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि आजम खान के लिए अखिलेश यादव ने जो मौन स्वीकृति दिखाई वह आने वाले समय की एक झलकी है. यदि मोदी एकबार फिर जीत जाते हैं तो वो लाज का बंधन भी टूटेगा जिसको बगल में दबाए अखिलेश यादव चलते हैं. एक महिला तो मायावती भी हैं लेकिन अभी उनका पूरा ध्यान मुस्लिम वोटबैंक पर लगा हुआ है. जयाप्रदा दूसरी तरफ इसका क्या जवाब देंगी यह वही जानें, लेकिन लोकतंत्र इस घटिया हरकत का जवाब देना जानता है.
आने वाले समय में हम देखेंगे कि राजनीति के बड़े माहिर खिलाड़ी कैसे सड़कछाप भाषा का प्रयोग कर राजनीति की शुचिता की धज्जियां उड़ाएंगे. इस बार का चुनाव कुछ पार्टियों के लिए अस्तित्व की लड़ाई है. अस्तित्व बचाने के लिए सब किया जाएगा. जनता तय करेगी कि किसको क्या मिलेगा, और किसका क्या बचेगा. बने रहिये हमारे साथ!
