चुनावी मौसम है भाई साहब. सब कुछ चल रहा है. विज्ञापन का दौर चल रहा है. कांस्पीरेसी थ्योरी की तो इन्तिहा हो गई है. तमाम लेख बता रहे हैं कि टीवी सीरियलों का इस्तेमाल सरकार के विज्ञापन के लिए हो रहा है. लेखकों के अपने तर्क हैं. पोर्टल्स के भी अपने इतिहास हैं. ऐसा ही लेख हमारी नज़र में भी आया. सोचा आपसे शेयर कर लें.
बात चली है प्रचार की. कहा गया कि ‘भाभी जी घर और हैं’ जैसे कार्यक्रम सरकार का विज्ञापन चला रहे हैं. एक वीडियो क्लिप भी चलाई जा रही है. क्लिप में बताया जा रहा है कि कैसे एक पात्र द्वारा नरेंद्र मोदी को देश का सर्वोच्च नेता घोषित किया जा रहा है.
ऐसे ही एक और टीवी सीरियल है जिसमें मुद्रा लोन की बात चल रही है. लेखक को इससे भी दिक्कत है. कह रहे हैं कि ‘नामुमकिन अब मुमकिन’ बोल कर प्रचार चल रहा है. चुनाव आयोग को भी धृतराष्ट्र बोल दिया गया है.
सभी तर्क सही मान भी लें, तो एक प्रश्न फिर भी उठेगा. प्रश्न यह है कि भारत सरकार ने यदि कुछ काम किया है, तो उसकी तारीफ क्यों न की जाए. किसी एक पार्टी का प्रचार तो यहां नहीं किया जा रहा. देश की सरकार की बात हो रही जिसको आपने भी चुना है.
दूसरी बात यह कि क्या देश के क्रांतिकारी लेखकों को चुनाव आयोग पर विश्वास नहीं है? या यह उसी एक काल्पनिक भय को उत्पन्न करने में अपनी भागीदारी दे रहे हैं जिसमें कहा जा रहा है कि सभी संवैधानिक संस्थाएं खतरे में हैं. अगर ऐसा है तो केंद्र में राज करने वाली पार्टी बिहार क्यों जीत नहीं पाई. क्यों उपचुनावों को नहीं जीत पाई. इसी चुनाव आयोग के तंत्र पर ही देश का विपक्ष छाती ठोक बोल रहा है कि नरेंद्र मोदी को हम ही हराएंगे.
यह समझ से परे है कि यह शोर क्यों मचाया जा रहा है. किसी चैनल को क्या दिखाना है या क्या नहीं, यह उसके निर्माता तय करते है, उसके निर्देशक तय करते हैं. इसमें यदि किसी को सरकार का प्रचार दिखाई देता है तो यह उसका अपना ओपिनियन है.
इंटरनेट की सबसे खास बात यह है कि यहां सब ओपिनियन का ही खेल है. पिछले दिनों होली के त्योहार पर भी तमाम ऑनलाइन पोर्टल्स द्वारा ओपिनियन बनाये जा रहे थे. अभी भी वही किया जा रहा है. बस थोड़ी चतुराई से…
जिन दो टीवी सीरियलों के क्लिप्स को निकालकर बताया जा रहा है कि यह सरकार का प्रचार है, उसको आप जागरूकता फैलाने का उद्देश्य भी समझ सकते हैं. टीवी सीरियलों का काम सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होता है. अगर मुद्रा लोन से महिलाएं कर्ज़ ले सकती हैं तो उसे बताना कहाँ गलत है.
यदि स्वच्छता के लिए जागरूकता लाई जाए, तो इसमें क्या गलत है. मोहनदास करमचंद गांधी ने स्वच्छता के प्रति जागरूकता की बात की थी. अब जब भी 26 जनवरी या 15 अगस्त को महात्मा गांधी का नाम लेकर टीवी सीरियलों के एपिसोड बनते हैं, तो उसमें तो बाकायदा एक राजनैतिक परिवार के सरनेम का इस्तेमाल होता है.
जागरूक लोगों को पता है कि ये ‘वो वाले गांधी’ नहीं है, लेकिन 70 सालों पुराना ब्रांड है, तो इनकैश किया जाता है. क्या इसको चुनाव प्रभावित करने का तरीका समझें?
आजकल तो इन्हीं टीवी सीरियलों में फिल्मों का प्रमोशन भी हो रहा है. उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह टीवी सीरियल प्रॉफिट मोटिव से बनाये जाते हैं. TRP उसमें मुख्य भूमिका निभाती है. यह चुनावों का मौसम है, तो उसका तड़का लगाना इन सीरियलों द्वारा स्वाभाविक सी बात है.
वैसे भी आदमी मौसम के हिसाब से ही कपड़े बदलता है. इसमें इतना हल्ला मचाना सच में समझ से परे है. वस्तुतः लेखकों के भीतर का प्रोपगंडा उनके लेखों में लिखे शब्दों से चिल्ला रहा है.
किसी व्यक्ति को एक चीज़ कैसे दिखती है, यह उसकी अपनी समझ पर निर्भर करता है. कई लोग इस लेख से भी असंतुष्ट हो सकते हैं, और ठीक भी है. लेकिन कम से कम छोटी बात को ले कर चुनावी प्रोपगंडा रचने का प्रयास न किया जाए, तो सोशल मीडिया के लिए भी बेहतर रहेगा,तथाकथित ओपिनियन मेकर्स के लिए भी.
लेकिन क्योंकि कुछ लोगों की नई टीम है, तो काम का प्रेशर समझ सकते हैं. उनको तो इसी भीड़ में खुद को ‘रेलेवेंट’ भी बनाये रखना है.
उसी हड़बड़ाहट में कभी ‘चुनरवाली’ की भीगी चुनरी से पाठक बटोरे जाते हैं तो कभी अंडरगारमेंट्स के प्रचार से. यही हड़बड़ाहट ऑनलाइन पोर्टल्स के मुख्य उद्देश्य को धूमिल कर देती है.
दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.
