सर्दियों में अक्सर वह सफेद बैकग्राउंड पर वायलेट रंग के शेड्स में महीन फूल-पत्तियों के छाप वाली साड़ी पहन कर आती थी. उसे देखते हीं मेरे सहकर्मी कहते थे; “लो सर आ गई आपकी बोरो प्लस की ट्यूब!” सच में वह बोरोप्लस के ट्यूब सरीखी ही थी, देखने में भी और व्यवहार से भी. रूखेपन को तो फटकने भी नहीं देती थी.
मजाक का एक भी मौका नहीं छोड़ने वाला कहता था कि मैडम अगर डिपार्टमेंट ने आपका ट्रांसफर भी कर दिया तो भी आप डेप्युटेशन में यहाँ नवंबर से फरवरी तक के लिए आ जाना. जवाब में वह एक मद्धिम सी मुस्कुराहट छोड़ देती थी.
एक बार लंबी वह छुट्टी पर गई और लौटते ही हेडक्वार्टर में ट्रांसफर हो गया. कई साल बीत गए, कुछ सहकर्मी सोशल मीडिया के माध्यम से दुबारा जुड़ गए पर वो इन सब झोल-झमेलों से दूर हीं रही.
एकाध बार हेडक्वार्टर भी जाना हुआ तो उसके चैंबर की ओर जाने की हिम्मत नहीं हुई. अरसे बाद एकेडमी में मिड करियर ट्रेनिंग के दौरान वह मिली. चेहरे पर उम्र हल्का असर तो था पर आँखों में वही चमक थी. औपचारिक अभिवादन करते हुए दोनों अपने-अपने ग्रुप की ओर बढ़ गए.
शाम के वक्त लॉन में बैठकर मैं क्रिमिनोलॉजी और फोरेंसिक विज्ञान पर आधारित एक किताब पढ़ रहा था. तभी वह अपने पसंदीदा शेड के साड़ी मे इसी ओर आती दिखी. झट से उठकर मुस्कुराते हुए मैने उसे बेंच पर बैठने को कहा; ‘ऋचा!” कुछ समय चुप्पी छाई रही.
उसका ध्यान किताब के कवर पर और मेरा ध्यान उसकी कलाई की बंधी घड़ी पर था. सिर्फ सूइयां चल रही थीं पर समय ठहर सा गया था.
कुछ देर बाद उसने शिकायती लहजे में कहा; “कई बार तुम हेडक्वार्टर आए मगर कभी मिले नहीं.” इसका जवाब मेरे पास नहीं था फिर भी मैंने ‘वो क्या है न कि…’ टाइप एक्सक्यूज से समझाने की नाकाम कोशिश की, फिर बेबाकी से कहा; “उन दिनों तुम्हारे हाव-भाव से प्रतीत होता था कि तुम्हारी निजी जिंदगी में कुछ उतार चढ़ाव है जिसे तुम अपनी मुस्कुराहटों के पीछे छुपा कर रखती हो. कलीग्स ने भी यही कहा कि शायद कुछ प्रॉब्लम्स हैं पर मैम किसी को शेयर नहीं करतीं. फिर अचानक लंबी छुट्टी पर और उधर से ही ट्रांसफर!”
ऋचा बोली; “30-35 साल के वर्क लाइफ में ट्रांसफर-पोस्टिंग ही यथार्थ है बाकी सब मिथ्या है. वैसे ये ट्रांसफर हुआ नहीं था, कराई थी. प्रॉब्लम्स तो आते-जाते रहते हैं. इनसे बेफिक्र होकर जीना ही जीवन दर्शन है, जो अब समझी हूँ. बिना प्रॉब्लम्स कुछ मिसिंग सा फील होता था.”
“एक बात बताओ, इतनी लंबी छुट्टी लेकर कहां गई थी? “
“छुट्टियों में मैसूर गई थी, नैन्सी के पास. उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. घरवालों की मर्जी के खिलाफ उसने वसंत से शादी की थी. 6 महीने भी नहीं हुए थे और वसंत ड्रग्स स्मगलर्स के साथ एनकाउंटर में……! नैन्सी का घर छूट ही गया था और जिसके लिए घर छोड़ा, वो भी छोड़ गया.उसने वसंत के डायरी से मेरा नम्बर ढूंढ कर कॉल किया और मैं अर्जेंट लीव लेकर चली गयी उसके पास.”
“नैन्सी तुम्हारे बारे में कैसे जानती थी?”
“वसंत उससे अक्सर मेरी बातें किया करता था. वह बताती है कि वसन्त मुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता था.”
“वसंत ने तुम्हें क्यूं छोड़ा?”
“शायद उसे नैन्सी ज्यादा पसंद थी.”
“तुम्हें भी कोई अच्छा-सा लड़का ढूंढ कर शादी कर लेनी चाहिए थी.”
“जरूरत नहीं लगी!”
“यह भी कोई लॉजिक है?”
“यही लॉजिक है. जिन रास्तों पर चलकर आत्मा को बींध ली, अब उन पर फिर से क्या चलें? नैन्सी को अपने साथ ले आई अब हम दोनों एक ही साथ रहते हैं. यहां से चलने के बाद उससे मिलाउंगी तुम्हें.”
“अपनी भी सुनाओ, तब से मैं ही बके जा रही हूं!”
“मैं देहरादून में 1 साल तक और रहा. फिर पूरी टीम को इधर से उधर भेज दिया गया. वहां तुलसी शर्मा के अगुवाई में एक नई टीम आई जिनको जरूरी निर्देश देकर मैं सिलचर में आ गया.”
“सिलचर के अलावे और विकल्प नहीं थे?”
“मैंने कोशिश नहीं की, इस बार मस्तूल खोलकर खुद को छोड़ देना था.”
“तो यूं ही बगैर मंजिल के ये किनारों से भागते कश्ती कब तक बने रहोगे?”
इसका उत्तर मेरे पास नहीं था. दोनों हाथों से उसने मेरे किताब वाले हाथ को थामने की कोशिश की.
“आज भी भारी लग रहे हैं मेरे हाथ तुम्हें?”
“शायद… अब रिपोर्टिंग टाइम हो रहा, फिर कल यहीं मिलते हैं.”
अगले दिन लेक्चर का सत्र था. सफेद बाल वाले वक्ता को बिना उंघे सुन लेना कम साहस का काम नहीं था. लंच के वक्त वह मेस में मिली. अब उसके होंठों से ज्यादा उसकी आंखें बोल रही थीं, साफगोई के साथ.
मेरा मन कभी उससे भागना चाहता था और कभी उसकी आंखों में देखना चाहता था. मैंने लंच करते हुए मन की दूसरी बात को मानना जारी रखा और उसने भी आंखों की उदारता बरकरार रखी. लंच के बाद मैं पुनः अपने सीट पर आफ्टरनून सेशन के लिए गया. ये सेशन साइबर सुरक्षा के बारे में था. इसके बाद घड़ी पर नजर जम गई और रेस-कोर्स पहुंचने के लिए मैसेज मिला.
शाम हुई और गंतव्य पर …! साइड में पत्थरों के स्लैब थे जिनके बगल में अमलतास का एक सूखा पेड़ था उसे अपराजिता की लताओं ने जकड़कर हरा भरा बनाने की पुरजोर कोशिश की थी. नीले रंग के फूल खिले हुए थे. वहीं बैठे 10 मिनट हुए होंगे कि वो भी आती दिखी, मैं स्लैब से उठ गया. उसने बेझिझक मेरे गले लगकर मुझे थोड़ा असहज कर दिया.
मैं एक क्षण के लिए जड़ सा हो गया. मैं एक नजर अमलतास और अपराजिता के फूलों को देख रहा था और एक नजर उसे. फिर मेरे हाथ अनायास ही उसे बांधने के लिए खुल गए. उसकी बालों में लगे पारंपरिक मोगरे के फूल मेरी नाक और होंठों के पास थे. घड़ी भर उस ‘दिव्यगंधा’ से बंधा रहा, फिर जैसे तंद्रा भंग हुई.
फिर स्लैब पर बैठकर लफ्जों में बरसों की दास्तान शुरू हुई जिसे सुनकर उसने सिर्फ एक वाक्य कहा; “जिद से अपनी जिंदगी को तबाह करना भी कौन सा उसूल है!”
“तुम भी वही कर रहे हो.”
“मेरी बात और है पर तुमको ऐसा नहीं होना चाहिए था.”
“रिश्तों की नींव को जब स्वार्थ के ऊपर देखा तो मुझे आश्चर्य हुआ. फिर फ्लैशबैक में सारे अनकहे सवालों के जवाब मिल गए और मैंने उस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दिया.”
“तो आगे की जिंदगी के बारे में क्या सोचा?”
“यही कि 15-16 साल इतनी तेजी से निकल गए, बाकी के भी यूँ ही निकल जाएंगे”

3 Comments
Sir very good feel baaki u hi gujar jayengey
पाठक हर कहानी में स्वयं को ढूंढने का प्रयास करता ही है। थोड़ा सा कथावाचक के बारे में और जानना चाहता था। पर शायद सब कुछ अस्पष्ट होना ही इस कहानी की शक्ति है जो इसे व्यापक प्रतिष्ठा व अभिप्राय प्रदान करती है।
“तुम ऋचा को चाहते थे और ऋचा ने वसंत को बतौर दोस्त पसंद किया। तुम हर्ट हुए और बाद में तुम जब भी हेडक्वार्टर गये जानबूझ कर कभी ऋचा से मिले नहीं।किसी को देख कर अनदेखा करना भी तुम्हारी ऋचा में रूचि प्रदर्शित करता है। ऋचा ने वसंत से दोस्ती निभाई और उसकी प्रेयसी नैन्सी का सहारा बनी। वह समय भी आया जब तुम जैसे अमलतास के एक सूखे पेड़ को ऋचा रूपी
अपराजिता की लता ने खुशी के नीले फूलों से आच्छादित कर दिया। बहुत सुंदर कहानी, बार बार पढ़ने को मन करता है।