भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आसन्न लोकसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है. घोषणापत्र तो क्या मैं इसे चेतावनी पत्र कहूँगा. अपने घोषणापत्र में कांग्रेस पार्टी कहती है कि वह नफरत भरे अपराधों की रोकथाम के लिए नया कानून पहले सत्र में ही पास करवाएगी.
सुनने में यह भले ही अच्छा लगता है लेकिन बेहद खतरनाक ‘साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा अधिनियम’ (Communal and Targeted Violence Bill) को ही फिर से परोसने की कोशिश है. इस कानून की यह मान्यता है कि दंगे हमेशा हिन्दू ही कराते हैं. इसमें मानसिक और भावनात्मक पीड़ा के लिए दंड का प्रावधान रहेगा.
प्रस्तावित कानून यह नहीं बताता कि भावनात्मक और मानसिक पीड़ा में कौन सी घटनाएं आएंगी. आइए, हम इसे समझने की कोशिश करते हैं. मान लीजिये सड़क पर चलते हुए आपकी साइकिल किसी कार से टकड़ा गई और आपका कार वाले से झगड़ा हो गया और दुर्योग से वह कार वाला एक अल्पसंख्यक हुआ तो आप इस कानून के अंतर्गत दोषी होंगे.
यदि आपने एक अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को घर किराए पर देने से मना कर दिया तो वह मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाकर आपको जेल भेज सकता है. कक्षा में इतिहास पढ़ाते हुए आप इस्लामिक अत्याचार की कहानी बताएं और अल्पसंख्यक समुदाय के किसी छात्र की भावना आहत हो सकती है तो आप जेल के अंदर पहुँच सकते हैं.
यहाँ तक कि तीन तलाक की आलोचना भी आपको जेल की रोटी चबाने पर मजबूर कर देगी. लेकिन किसी दंगे में एक हिन्दू महिला का बलात्कार हो जाये तो यह कानून उसे पीड़ित नहीं मानेगा क्योंकि इस कानून का आधार ही यह मान्यता है कि अल्पसंख्यक ही पीड़ित होगा. इस कानून में स्वयं को निर्दोष साबित करने का दायित्व आरोपी पर ही होगा. पीड़ित का बयान ही आरोपी के विरुद्ध प्रमाण होगा. इस कानून के लागू होने के बाद हिन्दू अपने ही देश में तीसरे दर्जे के नागरिक बन जायेंगे.
कांग्रेस का दूसरा वादा है कि वह देशद्रोह के कानून को खत्म करेगी. मतलब हिंदुस्तान मुर्दाबाद और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत छूट मिलेगी. लेकिन इन नारों से आपकी भावना आहत हो जाये और आप जवाब में हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगा दें तो सम्भव है कि आपको एक अल्पसंख्यक की भावना आहत करने के कारण साम्प्रदायिकता कानून में अंदर कर दिया जाये.
कांग्रेस ने यह भी वादा किया है कि वह भाजपा सरकार द्वारा पेश की गई नागरिकता संशोधन विधेयक को ख़ारिज कर देगी. भाजपा सरकार ने कोशिश की है कि मानवीय आधार पर पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे हिन्दुओं को भारत के नागरिकता का विकल्प दिया जाये. लेकिन कांग्रेस इसे स्वीकार नहीं करती. बेशक, बांग्लादेशी मुसलमान पहले की तरह बेरोकटोक भारत की डेमोग्राफी बदलने का काम जारी रख सकते हैं.
कश्मीर के सम्बन्ध में कांग्रेस के घोषणापत्र में स्पष्ट लिखा है कि वह धारा 370 को हाथ नही लगाएगी. इसके अलावा सुरक्षा बलों को मिले.विशेषाधिकार को भी वापस लेगी. इस विशेषाधिकार के खात्मे के बाद सेना और अर्धसैनिक बलों का काम और भी अधिक कठिन हो जाएगा.कैसी विडम्बना है कि कश्मीर की भूमि के लिए भारतीय सैनिक शहीद तो हो सकता है लेकिन उस भूमि पर उसका कोई अधिकार नहीं होगा.
कांग्रेस का घोषणापत्र उनलोगों के मुँह पर तमाचा है जो राहुल गाँधी को मन्दिरों का चक्कर लगाते देखकर यह मान बैठे थे कि कांग्रेस का हिन्दूविरोधी चरित्र बदल गया है और वह तुष्टिकरण की पार्टी से एक सामान्य पार्टी बन जाएगी. फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता के तहत मन्दिरों का चक्कर लगाना एक बात है और हिंन्दु हितों की रक्षा करना दूसरी बात.
कांग्रेस का घोषणापत्र चीख चीख कर कह रहा है कि कांग्रेस के चाल और चरित्र में कोई बदलाव नही होने वाला है. बेशक, जरुरत के हिसाब से भाव और भंगिमा बदली जा सकती है.
इस घोषणापत्र में अल्पसंख्यक शब्द दस बार आया है लेकिन हिन्दू शब्द नदारद है. वक्फ की चर्चा है.लेकिन गाय, गंगा, मठ-मन्दिर जैसे शब्द नही हैं. कश्मीर पर लम्बी चौड़ी घोषणा है लेकिन उसमें कश्मीरी पंडितों का जिक्र तक नही है. जामिया मिलिया विश्वविद्यालय और अलीगढ़ विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक संसथान की मान्यता सुरक्षित रखने का वादा है लेकिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की आत्मा के संरक्षण का कोई वादा नहीं है.
यह कांग्रेस का घोषणापत्र कम और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो अधिक लग रहा है. प्रश्न उठता है कि इस दुस्साहस का कारण क्या है. या तो कांग्रेस को यकीन है कि वह 2019 का चुनाव बुरी तरह हार रही है या फिर उसे लगता है कि इस देश का बहुसंख्यक 72 हजार का झुनझुना बजाते बजाते बलि के घाट पर स्वयं ही अपनी गर्दन लेकर पहुँच जाएगा.

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This is really shocking that they are appling all anty petronisum policy . It show that they are not loyal to their country and only want to get power to fulfill their unwanted motive n desire.