Poverty Tourism का ताजा संस्करण

आज देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को कालाहांडी में जनता को संबोधित करते देखा तो याद आया.

कालाहांडी, जहाँ से श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1980 में ग़रीबी हटाओ के नाम पर ‘पावर्टी टुरिज़म’ शुरू किया था. 4 साल बाद जब एक किसान को ग़रीबी के कारण अपना बच्चा बेचना पड़ा तो श्री राजीव गांधी ने 1984 में दूसरा पावर्टी टुरिज़म का राउंड लगाया.

इंदिरा जी और राजीव जी चले गए पर कालाहांडी की ग़रीबी नहीं गयी. परंतु राजीव जी की विधवा श्रीमती सोनिया गांधी से कालाहांडी की ग़रीबी ना देखी गयी और इस क्रम में उन्होंने भी सरकार बनते ही 2004 में पावर्टी टुरिज़म का तीसरा राउंड लगा कालाहांडी के ग़रीबों को बताया कि ‘मैं हूँ ना’.

कुल की परिपाटी को सुपुत्र श्री राहुल गांधी मीलों आगे ले जाते हुए वो कर गुज़रे जो तीन पीढ़ियाँ मिल कर के मुश्किल से कर पायीं थीं.अपनी सरकार रहते 2008, 2009, 2010 में बैक टू बैक तीन राउंड पावर्टी टुरिज़म के लगा डाले.पर ग़रीबी ससुरी ऐसी ज़िद्दी कि जाने का नाम ही ना ले.

इधर पाँच साल सत्ता से बाहर रहने के कारण  माता की बेचैनी बढ़ गयी थी, कमाई का कोई साधन रहा नहीं था. घर परिवार का ख़र्चा पुरानी ‘सेविंग’ के बल पर चल रहा था.

पुत्र सत्ता रहते भी कर्महीन था बिना सत्ता के लगभग निक़म्मा हो चला था. थाईलैंड, यूरोप के दौरों में वृद्धि हो चली थी कि अचानक चुनाव फिर आ गए. थाईलैंड में किए ‘मेडिटेशन’ का फ़ायदा ये हुआ कि अचानक राहुल जी के दिमाग़ में क्रांतिकारी आइडिया कौंधा ⚡. क्यों ना इस बार पावर्टी टुरिज़म से हट के कुछ और लाया जाए. चमचों के साथ मिल कर सीधा कैश देने की घोषणा कर देने पर बात फ़ाइनल हो गयी.

राहुल जी ने चमचों से कहा देखो जो जनता 4 पीढ़ी से सिर्फ़ पावर्टी टुरिज़म से मूर्ख बनती आ रही थी से सोचो डिरेक्ट कैश की सुन कर अब कम से कम 10 पीढ़ी तक इनको और मूर्ख बनाया जा सकता है. चमचों ने करतल ध्वनि से उनकी सराहना की. एक चूनेवाला नामक चमचे ने रोज़ की होम डिलिव्री का ऑर्डर कर दिया जिससे उनकी पंखुड़ीयाँ तोड़ कर राहुल जी पर पुष्प वर्षा कर दी जाए.

एक उजड्ड व बदतमीज़ चमचे ने पूछ ही लिया कि सर पत्रकार और जनता ये पूछेंगे कि पैसा आएगा कहाँ से तो क्या जवाब देंगे? क्रुद्ध दृष्टि से राहुल जी ने जब उस चमचे को घूरा तो हेड चमचा चाँदेवाला तुरंत कूद कर बीच में आ गया. चाँदेवाला ने कुटिल मुस्कान होंठों पर पहनी और अपनी लगभग कर्कश आवाज़  में बोला, हे जनेउ धारी दत्तात्रेय गोत्रि ब्राह्मण श्री राहुल जी गांधी जी, देखिए जनता तो पूछ ही नहीं सकती उनसे आप बात ही कब करते हैं. रहे पत्रकार तो प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में मैं हमेशा आपके साथ रहता हूँ.

आधे पत्रकार तो हमने अपने ही बैठे हैं आधे हमारे पुराने रुआब और डर से ऐसे सवाल पूछेंगे ही नहीं. फिर भी इस बदतमीज़ चमचे की तरह किसी ने पूछ लिया तो बस एक सेंटेन्स रटना है, मैं मानता हूँ कि काम बहुत कठिन है पर करना होगा.

बस रट कर उस एक ही सेंटेन्स को सबसे बोलना है.”हमने विदेशी स्पेशलिस्ट बुला कर स्कीम बनायी है और उन्होंने बताया है कि ये स्कीम feasible है”. इस विदेशी शब्द का हौंका ऐसा होता है कि इन देसी लोगों का मुँह एकदम बंद हो जाता है और ये बात आपसे और श्रीमती सोनिया जी गाँधी जी से बेहतर कौन जनता है. और इसके बाद देश के ग़रीब ने वो प्रेस कॉन्फ़्रेन्स TV रेडियो पर देखी और सुनी. भरोसा शायद इस बार किसी ने नहीं किया.

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