राहुल गांधी ने अभी हाल ही में यह कहा है कि यदि उनकी सरकार बनती है तो वो नीति आयोग को खत्म कर देंगे. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो लोग संवैधानिक संस्थाओं को बचाने को ले कर ‘मोदी हटाओ’ अभियान चला जा रहे हैं, वही लोग देश की एक संवैधानिक संस्था को खत्म करना का चुनावी मुद्दा ले कर चल रहे हैं.
अब जब संवैधानिक संस्थाओं पर बात हो ही रही है तो एकबार हम पूर्व में हुए बदलावों को भी देख लेते हैं. पिछली कांग्रेसी सरकारों पर यह आरोप लगते रहते हैं कि वह हर संवैधानिक संस्था के समानांतर एक दूसरी संस्था खड़ी करती है. NAC उसका एक उदाहरण है. यही कांग्रेस को उस नैतिक अधिकार से दूर करता है जिसमें वह संवैधानिक संस्थाओं के प्रभुत्व की बात करते हैं.
एक बड़ा आरोप यह भी लगता है कि तेल खदानों को प्राइवेट कम्पनियों को बेचा का रहा है. एक तार्किक व्यक्ति यह समझ सकता है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि आयात को छोड़ निर्यात पर ध्यान दिया जाए. देश में तेल के आयात ने देश की अर्थव्यवस्था का बोझ बढ़ाया है. इसलिए तेल खदानों के रखरखाव के लिए प्राइवेट कंपनियों का लाभ लिया गया. मनमोहन सिंह सरकार अपने शासनकाल में ONGC में विनिवेश की पक्षधर थी. देश में इन तेल खदानों से रिकवरी हो सके, इसके लिए यह किया गया है. इसमें राजनीति का आना दुर्भाग्यपूर्ण है.
यूपीए शासनकाल में देश के पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (पीएसयू) की क्या हालत थी, इसका उदाहरण हमें BSNL से मिलता है जिसने वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान ही आखिरी बार अपनी बैलेंस शीट में लाभ दिखाया था. यही कारण था कि उस समय BSNLअपने कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह देने में असमर्थ था. नेशन कैरियर का भी यही हाल था.
कुछ राजनैतिक पार्टियों को इस सरकार के दौरान अर्थव्यवस्था के सकारात्मक आंकड़े अच्छे नहीं लग रहे हैं. ज़ाहिर सी बात है कि राजनैतिक प्रतिद्वंदी होने के कारण वह ऐसा कर रहे हैं लेकिन जब विश्व बिरादरी की तरफ से भारत के सकारात्मक आंकड़े आ रहे हैं तो उसे क्यों झुठलाया जा रहा है. कम से कम देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रहार नहीं करना चाहिए. भारत अर्थव्यवस्था में GDP के उसी पुराने तरीके को अपना रहा है, जिसे विश्व वर्षों से अपनाता चला आ रहा है. भारत वही कर रहा है जो विश्व करता आ रहा है. बेस ईयर के उसी ग्लोबल पैटर्न को अपना रहा है, जो विश्व अपनाता है. जिस पार्टी में अर्थशास्त्री भरे हुए हों, उनसे ऐसी नादानी सच में हास्यास्पद है.
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