लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और कांग्रेस के उम्मीदवार राहुल गांधी अपनी पार्टी का वनवास खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए इस लड़ाई में सबसे आगे निकलती दिख रही है, लेकिन राहुल सुर्खियों में आने के लिए जोर लगा रहे हैं. पिछले महीने मोदी ने संकटग्रस्त किसान के खाते में सीधे नकदी हस्तांतरित करने की योजना का अनावरण किया और इसे उनके द्वारा वोटों का सबसे बड़ा वर्ग साधने के प्रयास के रूप में माना गया. इस योजना को सत्तारूढ़ गठबंधन ने एक गेम चेंजर के रूप में देखा गया था. विपक्ष को मोदी के विचार का मुकाबला करने के लिए बुरी तरह से कुछ बड़ा चुनावी मुद्दा चाहिए था.
हाल ही में राहुल गांधी ने घोषणा की है कि 50 मिलियन गरीब परिवारों को ₹72,000 प्रतिवर्ष दिया जाएगा. इसे उनकी पार्टी द्वारा बड़ी धमाकेदार घोषणा और ज़मीनी स्तर पर गरीबी तोड़ने वाला विचार कहा गया था, लेकिन कुछ सवाल हैं जिनका जवाब कांग्रेस के दिग्गजों को देना चाहिए. इस घोषणा के लिए 3,60,000 करोड़ रुपये की वार्षिक परिव्यय की आवश्यकता होगी. उन्हें देश को इस योजना के वित्तपोषण के स्रोत के बारे में बताना चाहिए.
वर्तमान राजकोषीय परिदृश्य को देखते हुए किसी भी पार्टी के लिए ऐसी किसी भी योजना को लागू करना असंभव होगा जब तक सामाजिक योजनाओं जैसे एससी / एसटी कल्याण, आयुष्मान भारत, मनरेगा आदि के लिए बजटीय आवंटन को समाप्त नहीं किया जाता है. अगर राहुल गांधी के पास कुछ और इरादे हैं, जैसे कि अपने चुनावी वादे को पूरा करने के लिए शिक्षा पर होने वाले खर्च को रोकना चाहते हैं तो उन्हें लोगों को यह बताने का साहस होना चाहिए कि वह चाहते हैं कि वे अशिक्षित रहें ताकि वे उन्हें भविष्य में भी सत्ता में पहुंचा सकें.
यह स्पष्ट है कि यदि कोई अन्य कल्याणकारी योजनाओं को बंद किए बिना इस तरह की योजना को लागू करना चाहता है तो या तो उसे टैक्स का बोझ बढ़ाना होगा या उसे कर्ज लेना होगा. कांग्रेस के अर्थशास्त्रियों को अपनी योजनाओं के बारे में बताना चाहिए कि वे इसे कैसे लागू करने जा रहे हैं. यदि उनके पास टैक्स बढ़ाने की योजना है, तो उन्हें यह समझाना होगा कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर मध्यम वर्ग के लोगों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाएगा.
यदि कांग्रेस के पास इस धमाकेदार योजना को खोजने के लिए धन उधार लेने की योजना है, तो इस पुरानी पार्टी के साथ निष्ठा रखने वाले अर्थशास्त्रियों को यह बताना चाहिए कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो वे कम राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर नहीं टिकेंगे क्योंकि यह संभव ही नहीं हो पायेगा. एक जवाबदेह राजनेता के रूप में इन लोगों को देश की आर्थिक स्थिरता पर इस तरह की योजनाओं के खतरों की व्याख्या करनी चाहिए और फिर इस देश के लोगों को यह तय करने देना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं.
वित्त वर्ष 2019-20 के लिए अंतरिम बजट के अनुसार कुल टैक्स राजस्व 1,977,693 रुपये के रूप में अनुमानित है. इस अतार्किक योजना पर इतने करोड़ का व्यय राजस्व प्राप्ति का लगभग 18 प्रतिशत आएगा. इस परिप्रेक्ष्य के लिए यह ध्यान देना चाहिए कि हमारे रक्षा बजट का हिस्सा उस राशि से कम है जिस आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष ने ‘वोट जीतने’ वाला वादा किया है.
एक नेता से कुछ सामाजिक मूल्यों को बढ़ावा देने की उम्मीद की जाती है. अगर हम राजनीति और राजकोषीय गणित को एक पल के लिए भी अलग रखते हैं तो मेरे मन में एक सवाल आता है कि राहुल गांधी इस देश में किस तरह की सामाजिक संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं? वह ईमानदार करदाताओं की कीमत पर मुफ्त में काम करना चाहते हैं. इस तरह के कदम युवा पीढ़ी को उद्यमशीलता से दूर करेंगे, जिसे मोदी ने सफलतापूर्वक शुरू किया है. क्या वह चाहते है कि भारत एक और वेनेजुएला बने?
चुनावी वादों का इतिहास और परिणाम राहुल गांधी को याद दिलाया जाना चाहिए कि उनकी दादी इंदिरा गांधी ने 1975 में “गरीबी हटाओ” का नारा बुलंद किया था और तब से देश ने कांग्रेस नेतृत्व को श्रीमती गांधी से लेकर राहुल गांधी तक बागडोर बदलते देखा है. लेकिन गरीबों की स्थिति नहीं बदली है.
राहुल गांधी को अच्छी तरह पता है कि वह मोदी को भ्रष्टाचार, विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति आदि मुद्दों पर नहीं हरा सकते हैं. उनकी बहन प्रियंका गांधी को पार्टी में शामिल करने से भी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा नहीं हो पाया है. इन सभी बातों पर विचार करने के बाद भी राहुल ने ऐसा कुछ कहा है जो वर्तमान आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में लागू करने योग्य नहीं है.
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