ठप्रेक: एक अनूठी विधा

यदि आप ट्विटर पर हैं और यहाँ कई बार ट्रेंड करने वाले #सतपरकास को नहीं जानते तो आपका ट्विटरीय जीवन बिना सुकर्मों वाला मनुज तन धरने जैसा है. जितने फॉलोवर्स से लोग यहाँ सेलेब समझे जाते हैं, उससे अधिक को सत्यप्रकाश चौबे उर्फ यस पी चौबे उर्फ सतपरकास ने ब्लॉकित कर रखा है.

हम सब यथार्थ और फतांसी के बीच जीते है किन्तु #सतपरकास जैसा चरित्र यथार्थ और फतांसी के बीच की दीवार ढ़हा देता है. आज सब एक दूसरे को सपने बेच रहे हैं. #सतपरकास भी सपने बेचते हैं किन्तु खुद को और स्वयं उसका प्रापण भी करते हैं. यही #सतपरकास की अनूठी बात है. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि लोपक मंडली इन्हे अपना गुरुवर मानती है और लोपक का गठन आरम्भ में इनके सुमिरन के लिए ही हुआ था.

एकतरफा प्यार, त्रिकोणीय प्यार और आजकल मेट्रो में बहुकोणीय प्यार तो सुना था, बहु पत्नी विवाह भी जानते थे पर प्यार का एक अनूठा रुप गुरुवर दर्शन से निकला – बहु-प्रेमिका मुँहबोला प्यार. यही मुँहबोलावाद ट्विटर पर लोक कल्याड के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इसी से वशीभूत होकर कुछ लोक कल्याड श्रद्धालुओं ने ट्विटर पर #ठप्रेक हैशटैग से तहलका मचाया था. लोगों ने आरम्भ में इसे एंकर-भयंकर महोदय के #लप्रेक की प्रतिक्रिया समझा.

लेकिन यह स्पष्ट होते देर नहीं लगी कि लोपक प्रतिक्रियावादी नहीं है और उसके कंटेन्ट ओरिजिनल होते हैं, कहीं से टीपे हुए नहीं. लोपक के शब्द तो स्वयं एकर भयंकर महोदय टीपते रहते हैं, उदाहरण के लिए लोपक की ट्विटर वार्ता से टीपा गया ‘सनातनी हिन्दू-तनातनी हिन्दू’ एंकर भयंकर महोदय के एक फेसबुक पोस्ट में पाया गया था. यह बात अलग है कि #ठप्रेक की आंधी में #लप्रेक कब और कहाँ उड़ गया, पता ही नहीं पड़ा.

#ठप्रेक क्या है, यह सवाल पूछना बेमानी है. शब्द विस्तार पर मत जाइए. #ठप्रेक श्रृंगार का सबसे गाढ़ा शेड है, व्यंग्य का सबसे महीन धागा है, भूलोट ठहाके का जनक है और साथ ही टीस उठाने वाली करुणा है. होली का समय है. मौका भी है और दस्तूर भी कि कुछ चुनिन्दा #ठप्रेक आपके समक्ष रखे जाएं.

चुनावी मौसम में व्यंग्य के महीन धागे को राजनीति या समाज से जोड़ते हुए #ठप्रेक ही सबसे पहले देना उचित होगा.

होली की चुहल से भरपूर तमाम ट्वीट्स आज भी आपको ट्विटर पर मिल जाएंगे.

एंकर भयंकर सहित पत्रकारों से चुहल करने से भी ट्वीटकार बाज नहीं आए …

गाँव के खांटी मिजाज हो या शहरी यो कल्चर, बचा कोई नहीं …

श्रृंगार के गाढ़े शेड्स वाले ट्वीट तो थोक में हैं ही … एक आधा एंटी-रोमांटिक नोट पर भी हैं.

यहाँ यह कहने में कोई झिझक नहीं कि श्रृंगार के शेड्स #ठप्रेक में इतने गाढ़े होने लगे कि मर्यादा की झीनी चादर एक्सपोज होने लगी और लोपक ने इसे वापस ले लिया. ऐसा नहीं होता तो #ठप्रेक साहित्य की एक स्थापित विधा होती. इससे परे आप होली के अवसर पर ठप्रेक का आनन्द लें. सारे #ठप्रेक यहाँ देना मुश्किल था, यदि आपका #ठप्रेक के उत्साही हैं तो ट्विटर पर हल्की खुदाई से आपको हजारों ठप्रेक मिल जाएंगे.

देखिए, दिखाइए, मजे लीजिए और होली की स्पिरिट में कहिए – #बुरा_न_मानो_होली_है.

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

दर्शन Surplus प्रदर्शन Deficit @rranjan501

1 Comment

  1. Prateek Arora
    March 20, 2019 - 12:23 pm

    waah PaSE..bahut khoob !!

Comments are closed.