2014 के बाद से ही लगभग सभी जर्नलिस्टों ने एक बात पर गांठ बांध ली थी कि सोशल मीडिया पर कुछ गलत हो रहा है तो वह केवल एक संघी ही कर सकता है. कोई भी अपराध अगर संघी या मोदी सपोर्टर करता है तो चार दिन तक चीख चीखकर के टीवी पर बताया जाएगा अन्यथा उस पर चुप्पी साध ली जाएगी.
पिछले वर्ष निखिल दधीच द्वारा गौरी लंकेश के खिलाफ अपशब्द कहे जाने पर दो दिन तक प्राइम टाइम पर डिबेट की गई. परन्तु आए दिन हमारे पत्रकार मोदी समर्थकों को गाली गलौज, धमकी, NDA के मंत्रियों की खिल्ली उड़ाने जैसी हरकतें करते हैं पर मीडिया वाले चूं तक नहीं करते . इस तरह का पक्षपात किसी अपराध की रिपोर्टिंग के समय भी किया जाता है. अगर आरोपी हिंदू है तो उसका धर्म हेडलाइन में बताया जाता है अन्यथा उसका ज़िक्र नहीं होता. Indiaspend ने भी सम्प्रदायिक हिंसा की जानकारी देते समय लोगों की गुमराह किया था. आपसी झगड़ों और एक ही समुदाय के झगड़ों को हिन्दू मुस्लिम झगड़ा बना दिया था.
कुछ दिन पहले बरखा दत्त को जब कुछ अश्लील तस्वीरें और संदेश भेजे गए तब उन्होंने मोदी समर्थकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया.
परन्तु आज जब सच्चाई सामने आई है, तब से उन्होंने एक भी ट्वीट नहीं किया. उन्हें तस्वीरें भेजने वाला कोई हिन्दू या मोदी समर्थक नहीं बल्कि शब्बीर गुरफान पिंजर है. एक घटना होने पर पूरे हिन्दू समाज को कटघरे में खड़ा करने वाला यह मीडिया क्या इस घटना में भी वही रुख अपनाएगा?
हो सकता है बरखा वाशिंगटन पोस्ट में एक आर्टिकल इस नाम से लिख दें कि वह गरीब और गुमराह किया हुआ युवक था और किसी मजबूरी के चलते उसने अपने निजी अंगों की तस्वीरे भेजी. शब्बीर के अलावा राजीव शर्मा, हेमराज कुमार और आदित्य कुमार ने भी बरखा को घटिया संदेश भेजे.
आखिर कब तक इस तरह से भेदभाव किया जाएगा? आतंकवाद की बात हो तो उसका कोई धर्म नहीं चीखने वालों को जैसे ही पता चलता है कि अपराध का ठीकरा हिंदुओं के सर फोड़ा जा सकता हो तो कैसे अचानक ही अपराध को धर्म और जाति दोनों का नाम मिल जाता है? या अगर अपराध का हिंदुओं से लेना देना न हो तो उसपे चुप्पी साध ली जाती है.
जनतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाली मीडिया जो रोज़ स्टूडियो से चीख चीख कर दूसरों पर इल्ज़ाम लगाती है, कभी अपने गिरेबान में भी झांक कर देख लेती तो आज इस आम नागरिक को पत्रकार का काम नहीं करना पड़ता.
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