वर्तमान पत्रकारिता या चाटुकारिता?

यदि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है तो पत्रकारिता स्वच्छ जल कहा जाना चाहिए. पत्रकारिता का दायित्व समाज के संघर्ष को प्रदर्शित करना है. पत्रकार राष्ट्र के सरोकार के हर मुद्दे मुखरता और जिम्मेदारी से उठाने का कार्य करता है. किन्तु वर्तमान पत्रकारिता अब तक के सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है, क्योंकि आज के पत्रकार वास्तविक पत्रकार न होकर पत्तलकार हो गए है. यह लांछन समूचे पत्रकार परिवार पर इसलिए लग रहा है क्योंकि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है.

आजाद भारत के इतिहास में सबसे बुरा दौर आपातकाल को ही माना जाता है किन्तु उस दौर में पत्रकारों को रोका गया पत्रकारिता को नहीं. पर आज पत्रकार पर चाटुकार होने का आरोप लगाया जा रहा है. इस आरोप का कारण चंद पत्रकारों द्वारा सरकार के विरोध में झूठा प्रोपेगैंडा तैयार करना है. फिर चाहे उनके इस कुकृत्य से राष्ट्र की आत्मा रुंआसी ही क्यों न हो जाए. ये पत्रकार प्रोपेगेंडा खड़ा करने में इस बात का कतई ध्यान नहीं रखते कि सच क्या है और झूठ क्या.

जुलाई 2014 में हुए सहारनपुर दंगे से लेकर अब तक प्रत्येक वह कार्य जिससे सरकार का ताल्लुक है या नहीं भी, उसका सरकार पर आरोप मढ़ देने का काम विपक्ष करता रहा है. विपक्ष के प्रत्येक मुद्दे पर मिर्च-मसाला लगाकर जनता के समक्ष परोसने का निकृष्ट काम कुछ पत्रकार कर रहे हैं. विपक्ष का काम  राजनीति करना ही है, उसे सत्ता की भूंख है किन्तु इन पत्रकारों को न जाने किस चीज़ की लालसा है. ये पत्रकार अवार्ड वापसी गैंग से लेकर टुकड़े-टुकड़े गैंग के पक्ष में अखबारों के पेज भरने व मीडिया में चींखते हैं, यहाँ तक तो ठीक था लेकिन जब यही पत्रकार पाकिस्तानी जेल में कैद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव के विरोध में भी लिखने लगते हैं तो दुःख बढ़ जाता है.

हाल ही में हुए पुलवामा हमले व उसके बाद अभिनन्दन केस में भी ये तथाकथित बुद्दिजीवी पत्रकारिता को कलंकित करने का घृणित कार्य कर रहे थे. इन पत्रकारों ने पुलावामा हमले में भारत सरकार को घेरने की कोशिश की ठीक हो सकती है, किन्तु पाकिस्तान में आतंकियों को मार गिराने पर पाकिस्तानी मीडिया से अधिक इनकी आंखों में आंसू दिखायी देना हज़ार प्रश्न खड़े करता है. ये पत्रकार अभिनन्दन मुद्दे पर भारत सरकार को नीचा दिखाने के लिए इतना अधिक आतुर थे कि पाकिस्तान की तारीफ़ में कसीदे पढ़ने लगे.

आतंकियों का पनाहगाह देश पाकिस्तान जिससे पूरी दुनिया नफरत कर रही है, वह इन्हें शांति का रक्षक दिखाई देता है. कुल मिलाकर ये तथाकथित पत्रकार यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि इस देश की सरकार व यहां के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए सभी कार्य गलत हैं व पाकिस्तान व वहाँ का प्रधानमंत्री इमरान खान शांति व नेकी को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैं.

पत्रकारिता के इन ‘महाज्ञानियों’ को  इस बात का सबसे बड़ा दुःख है कि पूर्व सरकारों द्वारा जो इन्हें मदद की जाती थी, व इनसे जुड़े हुए लेखकों की पुस्तकें थोक के भाव शासकीय पुस्तकालयों के लिए खरीदी जाती थीं, उस पर मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है. इसलिए इनकी हालत ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ जैसी हो गयी है. अर्थात इन्हें मोदी विरोध में राष्ट्रहित व राष्ट्रद्रोह का अंतर समझ नहीं आता है.