जमात-ए-इस्लामी पर लगे बैन से J&K में कट्टरपंथी ताकतें कमज़ोर

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अपने समर्थकों के साथ सड़कों पर उतर आयीं हैं. सड़क पर महबूबा का यह आंदोलन राज्य के कट्टरपंथी संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर)’ पर लगाए गए बैन के खिलाफ है. सनद रहे कि केंद्र सरकार ने इस कट्टरवादी संगठन पर पांच साल का प्रतिबंध लगाया है. सरकार ने आतंकवाद निरोधक कानून के तहत जमात-ए-इस्लामी पर पांच साल के लिए यह प्रतिबंध लगाया है.

इस प्रतिबंध पर फैसला प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में देश की सुरक्षा पर उच्चस्तरीय बैठक के बाद लिया गया. इसके बाद गृह मंत्रालय ने गैर कानूनी गतिविधि अधिनियम के अंतर्गत जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाते हुए अधिसूचना जारी की थी. महबूबा ने ट्वीट करके इस प्रतिबंध का विरोध भी जताया था. केंद्र ने उनके विरोध को तवज़्ज़ो नहीं दी तो उन्होंने सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने का फैसला किया.

प्रेस वार्ता में महबूबा ने धमकी भरे लहजे में कहा कि जमात-ए-इस्लामी पर बैन के प्रभाव खतरनाक होंगे. बीजेपी ऐसा करके जम्मू-कश्मीर को खुली जेल में तब्दील करने का काम कर रही है. जमात-ए-इस्लामी द्वारा संचालित स्कूलों में पढ़कर बच्चे परीक्षाओं में अच्छा स्थान लेकर आते हैं. क्या होगा जब आप उनके स्कूल बंद कर देंगे? साथ ही उन्होंने कहा जब हम जम्मू-कश्मीर में उनके साथ सत्ता में थे हमने ऐसे किसी भी प्रतिबंध का विरोध किया था.

यहाँ यह जानना आवश्यक है कि जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) पर बैन लगाने का कारण उसके द्वारा किए जा रहे कार्य हैं. खबरों की मानें तो जमात-ए-इस्लामी आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का अंग है. साथ ही ये दोनों संगठन मिलकर ही काम करते हैं. जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) 1941 में बने संगठन जमात-ए-इस्लामी का एक धड़ा है. इसकी स्थापना मौलाना अबुल अला मौदुदी ने किया था. यह संगठन इस्लामिक विचारधारा को लेकर काम करता था. देश बंटवारे के बाद यह कई अलग-अलग संगठनों में बंट गया, जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान तथा जमात-ए-इस्लामी हिंद व तीसरा जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर).

जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) की कश्मीर की राजनीति में अहम भूमिका है. वर्ष 1971 में इसने सक्रिय राजनीति में हिस्सा लिया. लेकिन उसे चुनाव में इसे एक भी सीट हासिल नहीं हुई. आगे के चुनाव में इसने अच्छा प्रदर्शन किया और जम्मू-कश्मीर की राजनीति में महत्वपूर्ण जगह बनायी. हालांकि अब इसे जम्मू कश्मीर में अलगाववादी विचारधारा और आतंकवादी मानसिकता के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

आतंकी गतिविधियों के कारण पहले भी इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. पहली बार जम्मू-कश्मीर सरकार ने 1975 में 2 साल के लिए बैन किया था, जबकि दूसरी बार केंद्र सरकार ने 1990 में इसे बैन किया था, जो अगले तीन साल तक जारी रहा था.

मतलब साफ है कि जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) की गतिविधियां संदिग्ध रही होंगीं, तभी सरकार ने उस पर बैन लगाया. महबूबा मुफ्ती के द्वारा इस बैन का विरोध करना गले से नहीं उतर रहा. आतंकी गतिविधियों में सम्मिलित किसी भी संगठन का समर्थन करने का मतलब आतंक को समर्थन करना है. महबूबा आज यह खुलकर कर रही हैं. इससे एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि विपक्ष मोदी विरोध करते करते राष्ट्र विरोध पर उतारू हो जाता है. विपक्ष के ऐसे कार्य भारत की के लिए अहितकर हैं. देखते हैं कि ये लोग मोदी विरोध में आखिर कितना गिरते हैं.




फोटो क्रेडिट

1 Comment

  1. Mark
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