आज की राजनीति और अजेंडा पत्रकारीता

ऐसा लगता है जैसे हर पार्टी अपने तरीके से एजेंडा सेट करने में लगी हुई है. हमारे उत्तर प्रदेश का टीपू तो ‘नए साल में नया प्रधानमंत्री’ को ही एजेंडा बना कर चल रहा है. मायावती के लिए हाथी जो कहेगा, एजेंडा वही हो जाएगा. इन सबके बीच सबसे क्लियर विज़न राहुल गांधी का है. उस बंदे को शुरुआत से पता है कि 2019 में जनता किसको चुनने वाली है. जो लोग राहुल गांधी को मूर्ख समझते हैं, वह जल्द ही बहुत निराश होने वाले हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि राहुल गांधी की नीति और गति, दोनों ही बेलगाम घोड़े की तरह दौड़े जा रही है. 

राहुल के लिए राफेल एक चुनावी मुद्दा है. वो सार्वजनिक मंचों पर इसको स्वीकार भी कर चुके हैं. कल जो राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, वो बस उनकी सोच की स्पष्टता को दर्शाता है. उनके दिमाग में यह बात क्लियर है कि चुनाव जीतने के लिए पहले दिखना पड़ता है. खुद को प्रासंगिक सिद्ध करने के लिए एजेंडा सेट करना पड़ता है. करीब डेढ़ दशक से राजनीति में सक्रिय होने के बाद उनको यह बात तो पता चल ही गयी है. 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल का सबूत ‘द हिन्दू’ में छपी एक रिपोर्ट थी. जैसे सावन के अंधे को सब हरा ही दिखाई देता है, वैसे ही राहुल जी को राफेल में कांस्पीरेसी ही दिखाई देती है. वैसे वो खुद ये स्वीकार कर चुके हैं कि राफेल में घोटाला है क्योंकि ‘वो कह रहे हैं कि घोटाला है.’ भले ही उनके पास सबूत न हो, कोई गवाह न हो, लेकिन वो जानते हैं कि घोटाला हुआ है. अंतर्मन के द्वार खोलकर छिपा सत्य निकाल लेने की सिद्धि भारतीय राजनीति में बहुत कम लोगों ने ही पाई है. इन सबके बीच ‘द हिन्दू’ का वह आर्टिकल भी देखें तो पता चलेगा कि मीडिया के एक वर्ग में भी 2019 की उथल-पुथल है.

आर्टिकल में क्या लिखा था, हम इसकी बात नहीं करेंगे क्योंकि पहले ही उसकी पोल ट्विटर पर खुल चुकी है. जो ट्विटर पर नहीं हैं, वो कुछ दिन इंतज़ार करें, हमें राहुल गांधी पर पूरा विश्वास है. यहाँ हम आपका ध्यान इस आर्टिकल को लिखने वाले लेखक और ‘द हिन्दू’ के संपादक एन. राम की ओर आकर्षित करना चाहेंगे, जिन्होंने बड़े ही साफ शब्दों में इस लेख के पीछे का कारण बताया है. जब मीडिया द्वारा उनसे पूछा गया कि इस आर्टिकल को लिखने से पहले क्या रक्षा मंत्री से बात की गई थी, तब उनका जवाब था; “तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर जी की तबियत ठीक नहीं है. अरुण जेटली जी का भी स्वास्थ्य ठीक नहीं है और वह यूएस में इलाज के लिए गए हैं. अतः उनको परेशान करना हमने अभी उचित नहीं समझा.”

अभी सम्पादक महोदय रुके नहीं. जब उनसे ‘आधे-अधूरे’ तथ्यों को रखने की बात की गई तो उन्होंने कहा; ”यह मेरा अधिकार है कि मैं क्या दिखाऊँ, और क्या नहीं…” शब्दों की स्पष्टता से यह साफ था कि पत्रकारिता के दो बड़े पैमानों पर ही समझौता कर लिया गया. कोई भी बड़ी खबर छापने, या किसी भी बड़े मुद्दे पर ‘एजेंडा’ बनाने से पहले उससे जुड़े मुख्य व्यक्तियों का ‘ओपिनियन’ लेना आवश्यक होता है. परंतु एन. राम ने यह करना उचित नहीं समझा. इसके साथ ही उनके लिए ‘मनपसंद’ खबर छापना उनका ‘विशेषाधिकार’ है. 

यह लूट्यन्स मीडिया के एक तबके का प्रतिबिम्ब है. ‘न खाता, न बही. जो हम कहे, वही सही’. राफेल कोई छोटा-मोटा सौदा नहीं है. यह भारत की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा सौदा है. इसपर किसी भी तरह की कोई भी रिपोर्ट छापने से पहले पूरी सतर्कता की उम्मीद किसी भी पत्रकार से की जानी चाहिए. कुछ साल पहले ‘डॉक्टर्ड वीडियो’ जैसा एक शब्द इसी लूट्यन्स मीडिया के एक तबके ने निकाला था. अब ‘डॉक्टर्ड डॉक्यूमेंट’ भी मार्केट में आ गया है. 

इसका असर फ्रांस और भारत के संबंधों पर पड़ सकता है. यह बेहद ही महत्वपूर्ण सौदा रद्द हो सकता है. क्या इसका आभास इतने ज़िम्मेदार लोगों को नहीं है? इसके ऊपर एन. राम का अपने हिसाब से खबर छापने का ‘विशेषाधिकार’ बहुत ही खतरनाक है. देश की जनता को भ्रमित करना लोकतंत्र में पाप है. जनता के पास जवाब देने का मौका हर पाँच साल में मिलता है, परंतु देश में यह एक बहुत ही खतरनाक ‘ट्रेंड’ है. अगर यह आगे बढ़ा, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ धराशायी हो जाएगा. वैसे भी इस पर ‘TRP’ के इतने विज्ञापन छप चुके हैं, कि इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य ही अब कहीं लुप्त हो गया है. पत्रकारिता में ऐसा व्यवहार ह-राम है.

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