द्रौपदी के बहुविवाह पर निरर्थक फेमिनिस्ट आउटरेज

हमारे धार्मिक ग्रंथों की आलोचना करने का फैशन आजकल जोरों पर है. राखी आने वाली हो तो मीडिया में राखी के पितृसत्ता को बढ़ावा देने वाले लेखों की बाढ़ सी आ जाती है. ऐसे ही होली पर ‘दलित’ होलिका के दहन, तो कृष्णाष्टमी पर रासलीला इत्यादि पर सवाल उठाये जाते हैं.

रामायण में इन्हें शूर्पनखा के साथ किया गया व्यवहार आपत्तिजनक लगता है, तो महाभारत में द्रौपदी का विवाह. आधुनिक नारीवादी (फेमिनिस्ट्स) द्रौपदी के विवाह प्रसंग का जिक्र कर तर्क करते हैं कि हिन्दू, स्त्रियों को मवेशी की तरह समझते हैं व उनके साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं. लेकिन द्रौपदी के विवाह के बारे में दिए गए ये तर्क सत्य की कसौटी पर कितना खड़ा उतरते हैं, आईए इसकी पड़ताल करते हैं.

चूँकि यह कहानी महाभारत की है, अतएव यही श्रेयस्कर होगा कि हम इस महाकाव्य में अपनी धारणाओं और दुराग्रहों को जबरदस्ती आविष्कृत करने की जगह, इसमें वर्णित श्लोकों और घटनाओं का अध्ययन करें और देखें कि तथ्य किस दिशा की ओर इंगित करते हैं. द्रौपदी के स्वयंवर की कथा से हम सभी परिचित हैं. राजा द्रुपद अपनी कन्या द्रौपदी के विवाह हेतु स्वयंवर का आयोजन करते हैं और घोषणा करते हैं कि जो पुरुष धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा कर, आकाश में स्थित एक यंत्र को पार कर लक्ष्यभेदन करेगा, द्रौपदी उसी की होगी. स्वयंवर में हिस्सा लेने के लिए दूर-दूर से राजा, युवराज, ब्राह्मण, संत इत्यादि एकत्रित होते हैं.

महाकाव्य के अनुसार ये सारे राजा और युवराज अपनी सारी ताकत झोंक देने के बावजूद धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में असफल रहते हैं. तत्पश्चात, सूर्यपुत्र कर्ण, द्रौपदी के प्रति आसक्त होने के कारण लक्ष्यभेदन की प्रतिज्ञा करके उठते हैं, पर कर्ण को देखकर द्रौपदी उच्च स्वर में कहती है- “मैं सूत जाति के पुरुष का वरण नहीं करूँगी.” यह सुनकर कर्ण ने अर्मषयुक्त हँसी के साथ सूर्य की ओर देखा और धनुष को नीचे रख दिया.”¹ तत्पश्चात, अर्जुन ब्राह्मणों के मध्य से उठते हैं और लक्ष्यभेद करते हैं. यह देखकर द्रौपदी अर्जुन को वरमाला पहना देती हैं. तत्पश्चात, भीम और अर्जुन, द्रौपदी को लेकर अपने निवास-स्थान पहुँचते हैं और कुंती को आवाज़ लगाते हैं; “माँ, देखो, हमने क्या पाया.” कुंती बिना उन्हें देख बोल उठती है; “अब तुम उसे साथ में साझा कर लो.”

जब कुंती द्रौपदी को देखती है तो वह चिल्ला उठती है; “हे भगवान, ये मैंने क्या कह दिया.”

अधर्म होने के भय से कुंती द्रौपदी को धर्मराज युधिष्ठिर के पास ले कर जाती हैं और इस दुविधा के बारे में बताकर ऐसी युक्ति बताने को कहती है जिससे कुंती के कथन की मर्यादा भी रहे, और द्रौपदी के साथ भी अधर्म न हो. युधिष्ठिर थोड़ी देर इस पर विचार करने के पश्चात अर्जुन को द्रौपदी से विवाह करने की आज्ञा देते हैं पर अर्जुन युधिष्ठिर से स्वयं को अधर्म में साझेदार होने से बचाने की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि धर्मशास्त्रों के अनुसार पहले युधिष्ठिर, तत्पश्चात भीम के विवाह के उपरान्त ही उनका विवाह हो सकता है. विचारोपरांत, युधिष्ठिर घोषणा करते हैं कि द्रौपदी पाँचो पांडवों की भार्या होगी.

आधुनिक फेमिनिस्ट्स यह तर्क देते हैं कि द्रौपदी ने स्वयंवर में अर्जुन का वरण किया था पर पांडवों ने उनकी सहमति के बगैर ही उन्हें पाँचों भाइयों की भार्या बना दिया. यह तर्क कितना सच है, आइये, देखते हैं. महाभारत के जितने भी प्राचीन संस्करण उपलब्ध हैं, उनमें से किसी में भी इस कुंती-युधिष्ठिर-अर्जुन संवाद के द्रौपदी के प्रतिक्रिया का वर्णन नहीं है. स्वयंवर के समय द्रौपदी की कर्ण के प्रति की गई टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि मनोकूल परिस्थिति न होने पर द्रौपदी अपने विचार प्रकट करने में संकोच नहीं करती थीं. अतएव इस घटनाक्रम से अगर उसे कोई दिक्कत नहीं होती तो वो युधिष्ठिर के इस फैसले को मूक सहमति न देती.

इतना ही नहीं, महाकाव्य में इस घटनाक्रम के ठीक बाद हुई घटनाओं से स्पष्ट है कि द्रौपदी को इस बहुविवाह से कोई दिक्कत नहीं थी, अपितु वो खुश थी.* जब कुंती द्रौपदी को घर की जिम्मेदारी सौंपते हुए उसे अपने पाँचों पतियों की तन्मयता से सेवा करने को कहती है तो द्रौपदी घर संभालने का कार्य सहर्ष स्वीकार करती है और अपने पाँचों पतियों को प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराती हैं. यह प्रकरण भी दर्शाता है कि द्रौपदी को इस स्थिति से आपत्ति न थी.

वर्तमान समाज में सहमति (Consent) पर काफी बल दिया जाता है. यहाँ तथ्य यह सुनिश्चित करते हैं कि द्रौपदी की इस बहुपति विवाह में सहमति थी. ऐसे में फेमिनिस्टों का इस पर प्रलाप बेमानी ही सिद्ध होता है

दृष्टाव् सूतम मेनिरे पाण्डुपुत्रा   

भित्वा नीतं लक्ष्यवरं धरायाम।   

धनुर्धरा रागकृतप्रतिज्ञ   

मत्यागनिसोमार्कमथार्कपुत्रम।।     

दृष्टाव् तु तं द्रौपदी वाक्यमुच्चै-   

र्जगाद नाहं वरयामि सूतम।   

सामर्षहासं प्रसमीक्ष्य सूर्ये   

तत्याज कर्ण: स्फुर्तितंधनुस्तत्।।

द्रौपदी की सहमति के पीछे का एक बड़ा कारण तत्कालीन काल में बहुपति प्रथा की मान्यता भी था. कई राज्यों, और कई जातियों (विशेषकर ब्राह्मणों) में यह प्रथा मान्य थी. यहाँ तक कि महाराज द्रुपद के इसका विरोध करने पर ऋषि व्यास ने इसे धर्मसम्मत बताया था.

Engineer who has interest in Politics, History & Culture - @TheKunwarKhan

1 Comment

  1. Jan
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