क्यों है कुम्भ हिन्दू धर्म में विशेष और क्या होते हैं अखाड़े?

ग्रह नक्षत्रों के विचरण के अनुसार, हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में सदियों से हर तीसरे वर्ष अर्ध या पूर्ण कुम्भ का आयोजन होता है. यह मूल रूप में बृहस्पति और सूर्य ग्रह की स्थिति के आधार पर विभिन्न स्थानों पर मनाया जाता है. खगोलीय गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है. इस दिन को विशेष मांगलिक समझा जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन उच्च लोक के द्वार खुलते हैं और इस दिन कुंभ स्नान करने से आत्मा को उच्च लोक की प्राप्ति होती है.

कुंभ में अखाड़ो का महत्व ज्यादा हीं झलकता हैं. अखाड़ों की पेशवाई के समय, स्नान भी थम जाता है. पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा या साधुओं का जत्था कहा जाता था.  . साधुओं के जत्थे में तद्वीर होते थे. अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ. अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत होता है. कुछ लोगो का यह भी कहना है कि अखाडा शब्द की उत्पति अक्षवाट से हुई.  

अखाड़ा संतों की उस सेना या संगठन को कहा जाता है जो धर्म की रक्षा के लिए गठित किए गए हैं. अपने धर्म, धर्मस्थल, धर्मग्रंथ, धर्म संस्कृति और धार्मिक परंपराओं की रक्षा के लिए किसी जमाने में संतों ने मिलकर एक सेना का गठन किया था. वही सेना आज अखाड़ों के रूप में विद्यमान है. शंकराचार्य  ने देश के चार कोनों में चार शंकर मठों और दसनामी संप्रदाय की स्थापना की. बाद में इन्हीं दशनामी संन्यासियों के अनेक अखाड़े प्रसिद्ध हुए, जिनमें सात पंचायती अखाड़े आज भी अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत समाज में कार्यरत हैं.

सन्‌ 660 में सर्वप्रथम आवाह्‍न अखाड़ा, सन्‌ 760 में अटल अखाड़ा, उसके बाद महानिर्वाणी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा और अंत में सन्‌ 1259 में जूना अखाड़े की स्थापना का उल्लेख  है. शैव दसनामी संन्यासियों की तरह वैष्णव साधुओं के भी संगठन बनें, जिन्हें उन्होंने अणी नाम दिया. अणी का अर्थ होता है सेना. गुरु नानकदेव के सुपुत्र श्री श्रीचंद्र द्वारा स्थापित उदासीन संप्रदाय भी चला, जिसके आज दो अखाड़े कार्यरत हैं. एक श्रीपंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन और दूसरा श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन. इसी तरह पिछली शताब्दी में सिख साधुओं के एक नए संप्रदाय निर्मल संप्रदाय और उसके अधीन श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा का भी उदय हुआ. बाकी कुंभ मेलों में सभी अखाड़े एक साथ स्नान करते है लेकिन नासिक के कुंभ में वैष्णव अखाड़े नासिक में और शैव अखाड़े त्र्यंबकेश्वर में स्नान करते हैं. यह व्यवस्था पेशवा के दौर में कायम की गई जो सन् 1772 से चली आ रही है. 

मूलत: कुंभ या अर्धकुंभ में साधु-संतों के कुल 13 अखाड़े भाग लेते हैं. इन अखाड़ों की प्राचीन काल से ही स्नान पर्व की परंपरा चली आ रही है. इन अखाड़ों के नाम हैं : –

शैव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े

  • श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- प्रयाग 
  • श्री पंच अटल अखाड़ा- वाराणसी 
  • श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी-  प्रयाग
  • श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती- त्रंब्यकेश्वर, नासिक 
  • श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- वाराणसी 
  • श्री पंचदशनाम आह्वान अखाड़ा-  वाराणसी 
  • श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ 

बैरागी वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े

  • श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी, खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा 
  • श्री निर्वानी आनी अखाड़ा-  अयोध्या
  • श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा-  वृंदावन, मथुरा 

उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े

  • श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा-  प्रयाग 
  • श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- हरिद्वार
  • श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा-  हरिद्वार 

वर्ष 1310 के महाकुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णवों के बीच हुए झगड़े ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया था. वर्ष 1398 के अर्धकुंभ में तो तैमूर लंग के आक्रमण से कई जानें गई थीं. वर्ष 1760 में शैव संन्यासियों व वैष्णव बैरागियों के बीच संघर्ष हुआ था. 1796 के कुंभ में भी शैव संन्यासी और निर्मल संप्रदाय आपस में भिड़ गए थे.  विभिन्न धार्मिक समागमों और खासकर कुंभ मेलों के अवसर पर साधु संगतों के झगड़ों और खूनी टकराव की बढ़ती घटनाओं से बचने के लिए अखाड़ा परिषद की स्थापना की गई, जो सरकार से मान्यता प्राप्त है. इसमें कुल मिलाकर तेरह अखाड़ों को शामिल किया गया है. प्रत्येक कुंभ में शाही स्नान के दौरान इनका क्रम तय है.

इन सब मेँ सबसे प्रगतिशील जूना अखाड़ा को माना जाता है. दलित महामण्डलेश्वर और किन्नरों को शाही स्नान में शामिल करने के कारण, इस अखाड़े को समकालीन विचारों का माना जाता हैं. हालांकि 2017 में निरंजनी अखाड़े ने भी अपने शीर्ष सन्यासियों में दलित को शामिल किया था.

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फोटो क्रेडिट: CMO UP

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