भाजपा के लाख प्रयासों के बाद भी पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह को रथयात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी. अमित शाह को तमाम बाधाओं के बाद मालदा में रैली की अनुमति आखिरी मिनटों में मिली. लेकिन 23 जनवरी को झारग्राम में उनके हेलिकॉप्टर को उतरने ही नही दिया गया.
स्मृति ईरानी को अपना हेलिकॉप्टर कलाईकुंडा एयरफोर्स बेस पर उतार कर रैली में पहुंचना पड़ा. 3 फरवरी को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बालुरघाट और रायगंज की रैली को टेलीफ़ोन से सम्बोधित करना पड़ा क्योंकि उन्हें भी हेलिकॉप्टर उतारने की अनुमति नही मिली. 5 फरवरी की पुरुलिया रैली के लिए योगी आदित्यनाथ को अपना हेलीकाप्टर झारखंड के बोकारो में उतारना पड़ा और जान जोखिम में डालकर नक्सल प्रभावित क्षेत्र से होकर रैली स्थल तक जाना पड़ा. मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और शाहनवाज हुसैन को भी अनुमति न मिलने के कारण अपनी रैली को स्थगित करना पड़ी.
यह सबकुछ हो रहा है सुश्री ममता बनर्जी की जिद्द के कारण जो किसी भी कीमत पर भाजपा को सामान्य राजनीतिक गतिविधियां चलाने की अनुमति नही देना चाहती हैं. 2011 में ममता बनर्जी बदलाव के नारे के साथ जनता के बीच गई थीं. पश्चिम बंगाल की जनता तब वाममोर्चा के कुशासन, अहंकार और अलोकतांत्रिक कार्यपद्धति से परेशान थी. इसीलिए उसने ममता बनर्जी को मौका देना ठीक समझा. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वाममोर्चा में जो अहंकार सात बार लगातार सरकार बनाने के बाद आया था, वह ममता बनर्जी में पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही आ गया.
याद करें तो 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को ममता बनर्जी ने रस्सी से बांधकर घसीटने की बात की थी. उसके बाद से लगातार भाजपा का ग्राफ बंगाल में बढ़ा ही है. आज भाजपा बंगाल की राजनीति में नम्बर 2 पार्टी मानी जा रही है. जिस तेजी से भाजपा का आगे बढी है, उसी तेजी से ममता बनर्जी सरकार का दमन तन्त्र भी आगे बढ़ा है. पिछले पांच वर्षों में भाजपा के दर्जनों कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई. पंचायत चुनावों में भाजपा के उम्मीदवारों के पर्चे फाड़ दिए गये. जीते हुए उम्मीदवारों को भी जान बचाने के लिए दूसरे राज्यों में शरण लेना पड़ा है. जैसे जैसे लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, वैसे वैसे दमन बढ़ता जा रहा है. दिलचस्प यह भी है कि ये सब करते हुए सुश्री ममता बनर्जी भाजपा की सरकार पर ही तानाशाही और हिटलरशाही का आरोप लगा रही हैं.
प्रत्येक राजनीतिक और अराजनीतिक संगठन को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और शांतिपूर्ण जनसभा का अधिकार है. भारतीय गणराज्य के किसी भी हिस्से में स्वतन्त्रता पूर्वक भ्रमण करने का भी अधिकार इस देश के नागरिकों को प्राप्त है. यह अधिकार भारत का संविधान, भारत के नागरिकों को देता है. जनसभा और आन्दोलन तो लोकतंत्र का श्रृंगार है.
जनता को भी यह अधिकार है कि वह सभी दलों की बातें सुने और फिर अपने सही-बुरे का निर्णय करे. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि पश्चिम बंगाल की सरकार को इन चीजों से कोई मतलब नही रह गया है. ममता बनर्जी येन-केन-प्रकारेण पश्चिम बंगाल की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखना चाहती हैं. लेकिन ये तरीके शायद ही कभी कारगर साबित होते हों.
1993 में युवा कांग्रेस की नेत्री के तौर पर ममता बनर्जी जब एक प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही थीं तो तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी थी. दर्जन भर कांग्रेसी कार्यकर्ता मारे गये थे. लेकिन इस दमन से ममता बनर्जी कमजोर नही हुई. वे बड़ी तेजी से एक नेता के तौर पर आगे बढ़ीं और वाममोर्चा के गढ़ को ढहा दिया.
ऐसा लगता है कि जो गलती ज्योति बसु ने की, ममता वही दोहराने पर अमादा हैं. उन्हें याद रखना चाहिए कि भारत की जनता हर बात सहन कर लेती है लेकिन वह अपने शासकों के अहंकार को सहन नही करती. यदि उन्होंने अपने रवैये में बदलाव नहीं किया तो तृणमूल को भी उसी नतीजे के लिए तैयार रहना चाहिए जो 2011 में वाममोर्चा को मिला था.
