राजस्थान में नई सरकार बनी है. ज़ाहिर सी बात है कि कुछ बदलाव अब राज्य में देखा जाएगा. सकारात्मक, या नकारात्मक यह तो समय के गर्भ में छिपा हुआ है. फिलहाल ताज़ा बदलाव देखने को मिला है पंचायती चुनाव अधिनियम को ले कर. सरकार बने अभी एक महीना भी नहीं हुआ है लेकिन अभी से बड़े बदलाव होने शुरू हो गए हैं. पुरानी योजनाओं के नाम बदलने के बाद अब पंचायती चुनावों में शैक्षणिक योग्यता पर नया फैसला लिया गया है. दरअसल, राजस्थान में पिछली वसुंधरा राजे सरकार ने पंचायती चुनावों में चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति की एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य कर दी था. राजस्थान की गहलोत सरकार ने इसको बदल दिया है. पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 19 में बड़ा फेरबदल करते हुए गहलोत सरकार ने नया नियम बनाया है. पंचायत चुनावों में प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई अनपढ़ व्यक्ति भी चुनाव लड़ सकता है. इसके पीछे तर्क दिया गया है कि लोकतंत्र में सबको चुनाव लड़ने का अधिकार होना चाहिए.
इस तर्क की एक परिणति देखिए. छत्तीसगढ़ में भूपेश वघेल के मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था. राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल शपथ दिलवा रही थी. तभी एक विधायक जी ऐसे भी आये जिनसे खुद का शपथ ग्रहण पत्र तक नहीं पढ़ा गया. बात चली तो पता चला कि वे कभी स्कूल भी नही गए थे. विधायक जी का नाम था कवासी लखमा जो छत्तीसगढ़ के कोंडा से चुनाव जीतकर आये थे. स्थिति यह हो गयी कि राज्य की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पूरा शपथ ग्रहण का पर्चा पढ़ना पड़ा जिसको लखमा दोहराते गए. कोढ़ में खाज ये कि विधायक जी अब मंत्रिमंडल में भी हैं. राजस्थान से ही एक और घटना सुनिए. राजस्थान में वर्तमान शिक्षा मंत्री गोविंद डोटासरा से पूछा गया कि महाराणा प्रताप और अकबर में कौन महान था तो उनको महाराणा प्रताप को महान कहने में झिझक महसूस होने लगी. उनका कहना था कि जनता से पूछेंगे, फिर जो जनभावना कहेगी वही करेंगे. राजस्थान के गौरव कहे जाने वाले वीर महाराणा प्रताप जी के बारे में राज्य के शिक्षा मंत्री की यह राय थी. राजस्थान का बच्चा बच्चा यह बता देगा कि महाराणा प्रताप और अकबर में महान कौन था, परंतु अब मंत्री जी बनाए जा चुके थे.
राजस्थान की नई सरकार ने जिस प्रकार से यह बड़ा बदलाव किया है, वो वहां के युवा वर्ग को पसन्द आएगा या नहीं, यह तो समय बताएगा लेकिन ‘राजीव जी कंप्यूटर लाए’ चिल्लाने के बाद ‘अनपढ़ भी चुनाव लड़ सकता है’ वाली बात कुछ हज़म नहीं होती. शैक्षणिक योग्यता पर ‘लोकतंत्र’ की चादर चढ़ाकर उसे ढ़कने का प्रयास कहाँ तक सही है, यह राजस्थान की जनता तय करे. वैसे जानकारी के लिए आपको बता दें कि हरियाणा में भी यह ‘शैक्षणिक योग्यता’ वाली अनिवार्यता लागू की जा चुकी है. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपनी विकासशील सोच का परिचय दिया है. वो समझ गए कि विकासशील भारत मे शिक्षा का क्या महत्व है. हरियाणा में उनका नेतृत्व लगातार हरियाणा के हित में प्रयासरत है. वैसे भी मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा में बड़े बदलाव करने के लिए जाना जाता है, लेकिन दुर्भाग्य है कि मीडिया इस ओर ध्यान नहीं देती.
सोचिये कि एक व्यक्ति जिसने अपने जीवन में एक साईकल भी न चलाई हो, उसको सीधा ट्रक चलाने को दे दिया जाए तो? खाली हाईवे पर भी वो एक्सीडेंट करवा आएगा. यही स्थिति शैक्षणिक योग्यता के बिना एक प्रतिनिधि की होती है. उसके पास अनुभव न भी हो, फिर भी वह अपनी शैक्षणिक योग्यता से सही और गलत निर्णय में अंतर कर सकता है. अब यहाँ समझने वाली बात यह है कि आखिर नई चुनी हुई सरकार इस बड़े विषय पर कैसे चूक सकती है या यह जानबूझकर की गयी चूक है जिसमे स्वार्थ निहित है? गहलोत जी जैसे अनुभवी व्यक्ति द्वारा ऐसा करना थोड़ा आश्चर्यजनक है. जब दुनिया 21वी सदी में है तो पाषाणकाल वाले नियम क्या राजस्थान को आगे ले जाएंगे? नई चुनी हुई सरकार को यह सोचना पड़ेगा.
