यह पूरी कहानी शुरू होती है पानीपत के युद्ध के बाद 1528 ई० में जब बाबर के सेनापति ने अयोध्या की उस जमीन पर बने मंदिर को तोपों से उड़ा देने का आदेश दिया. 15 दिन तक स्थानीय लोगों से लड़ाई चली. मगर यह आवश्यक बात नहीं. आवश्यक यह है कि आखिर मंदिर तोड़ा क्यों? पुरातत्व विभाग के K. K. मोहम्मद पहले ही उस जमीन के नीचे मंदिर होने की पुष्टि कर चुके हैं. खैर, वो तो बहुत बाद की बात है. पहले इसका इतिहास समझिये.
1930 में अंग्रेजों ने अयोध्या में हिंदुओं पर ‘पेनल्टी’ लगाई. ध्यान दीजियेगा, अयोध्या की जनता पर नहीं बल्कि हिंदुओं पर ‘पेनल्टी’ लगाई. 1936 जब देश आजाद भी नहीं हुआ था तब उस ‘तीन गुम्बद वाले’ विवादित ढाँचे पर जनता ने हमला बोल दिया था. जब यहां तीन गुम्बद लिखा जा रहा है तो उसको वही पढ़ें क्योंकि आप किसी भी मस्जिद में जाइये, वहाँ जो भी मिलेगा वो उस विवादित ढाँचे के अंदर नहीं था. डैमेज भी बहुत हुआ. 1930 में लगी हिंदुओं पर ‘पेनाल्टी’ से ब्रिटिश सरकार को 84,000 रुपयों का राजस्व मिला था. उस समय के 84,000 रुपये सोचिए आज कितने करोड़ रुपये होंगे? अब इसी पैसे से क्षतिग्रस्त ढांचे की मरम्मत अंग्रेज़ी हुकूमत ने कराई थी. यहाँ बात खत्म हो गयी, लेकिन लोगों के भीतर का उबाल अभी भी बहुत ज़्यादा था. जन्मभूमि के लिये एक बार फिर वहाँ लोगों का कब्ज़ा हो गया और इस बार ऐसा हुआ कि 1934 के बाद कोई वहां घुसा ही नहीं. अब देश की आज़ादी के बाद 22 दिसंबर 1949 को उन तीन गुम्बदों वाले ढाँचे में 40-50 लड़के घुस गए. आधी रात में और दिसंबर के महीने के अंदर सोचिए कितनी ठंड होगी? देश नया-नया आज़ाद हुआ था. सुबह हुई और लोगों ने पाया कि वहां मूर्तियां रखी हुई हैं. लोगों ने तो कहा कि भगवान धरती फाड़ कर अवतरित हुए हैं. यह स्थानीय भावनाएं थीं. लोग कीर्तन करने बैठ गए. अब सोचिए कि सारे हिंदुस्तान की 125 करोड़ जनता एक तरफ और अयोध्या के 25 हज़ार एक तरफ. कितना खून बहेगा कोई हिसाब भी नहीं लगा सकता था. धार्मिक भावनाएं होती ही ऐसी हैं. ऊपर से जब आपकी ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया हो. यही कारण है कि कोई इसको छूता नहीं है.
अब यदि यह ज़मीन उन तीन गुंबदों को लगवाने वाले की थी तो FIR तो बनता है. आखिरकार जब आपके घर में कोई आकर आपको घर से बाहर निकाल दे तो आप पहले FIR ही करोगे? कोई FIR नहीं है. एक भी रिपोर्ट नहीं है. 1961 का एक मुकदमा है बस! कोई रिपोर्ट नहीं. 1949 से 1961, 11 साल, 11 महीने और 21 दिन तक कोई रिपोर्ट ही नहीं थी. उस समय के प्रधानमंत्री थे जवाहर लाल नेहरू. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे गोविंद वल्लभ पंत. आदेश आया कि मूर्तियां रखी गयी हैं. इनको हटाया जाए. कलेक्टर ने कहा कि वो हटा नहीं सकते हैं. तो अब क्या करें? तो जिन मस्जिदों में दरवाजे होते ही नहीं हैं, वहां पर लोहे के दरवाजे लगवा कर ताले लगवा दिए गए. दूसरी पक्ष से किसी भी व्यक्ति ने कुछ नहीं बोला. उनके हिसाब से तो ज़मीन उनकी थी? तो बोला क्यों नहीं? अब मुसलमान तो गए नहीं वहाँ, लेकिन हिंदू फिर भी ताले के बाहर से ही अपने ईश्वर की पूजा अर्चना करने लगे. ठीक वैसे ही जैसे दूर से फूल चढ़ा दिया जाता है, पैसा चढ़ जाता है, प्रसाद मिल जाता है. यही सब शुरू हो गया. अब ये पैसा जाए कहाँ? तो सरकार ने राम जन्मभूमि के नाम पर एक एकाउंट खुलवा दिया. एक अकाउंटेंट भी पण्डित के रूप में बैठा दिया गया. देखते-देखते 1983 आ गया. 1983 में ही एक हिंदू सम्मेलन मुज़फ्फर नगर में हुआ. वहाँ एक कांग्रेस के नेता जी आये थे, नाम था दाऊदयाल खन्ना. उस समय जहाँ भी रैली के लिए जाते थे तो कहते थे कि मथुरा को स्वतंत्र कराना है, वाराणसी को स्वतंत्र कराना है, अयोध्या को स्वतंत्र कराना है. उस हिंदू सभा में गुलज़ारी लाल नन्दा भी थे. तब जा कर दाऊ जी को यह पता चला कि भगवान ताले में पड़े हैं. 1983 में इलाहाबाद में एक शीत शिविर हुआ था. वहां बाला साहेब ठाकरे भी थे. बाला साहेब को पता चला कि आखिर भगवान ताले में क्यों हैं. बाला साहेब की संघ के रज्जू भइया से इस विषय पर बात हुई. संघ के रज्जू भइया ने अशोक सिंघल जी से इस मामले पर बात की और कहा कि ज़रा अध्ययन करो ये क्या है? अशोक जी ने अध्ययन करने के बाद सीधे कांग्रेस के दाऊदयाल खन्ना का साथ पकड़ा और पूछा कि ‘बाबू जी, पीछे तो नहीं हट जाओगे? कांग्रेस के हो तो पता नहीं क्या हो जाये?’ उस समय अशोक सिंघल विश्व हिंदू परिषद में जा चुके थे. यहाँ से शुरू हुई ताला खुलवाने की लड़ाई. 1 फरवरी, 1986 को ‘बाई दी आर्डर ऑफ डिस्ट्रिक्ट जज’ ताला खुलवा दिया गया. यहां से इस पूरे मामले में विश्व हिंदू परिषद ने झंडा थामा और उसकी ‘एंट्री’ हुई. अब जानकार इस बात को जानते हैं कि 1992 में वह ढाँचा पूरी तरह से लगभग गायब हो चुका था. किसी को नहीं पता कि गया कहाँ? हल्ला ये हुआ कि ‘बाबरी मस्जिद’ गिरा दी गयी है. जहाँ सालों से नमाज़ ही नहीं हुई, वहाँ मस्जिद की स्वायत्तता दे दी गयी. किसने दी? पता नहीं. हल्ला आज तक इसी का होता आया है. तत्कालीन केंद्र सरकार ने 4 सरकारें टर्मिनेट कर दी. 4 राज्यों की सरकारें! उत्तर प्रदेश की सरकार तो समझ में आता है, लेकिन क्या सोच कर राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल की सरकार को टर्मिनेट किया गया? खैर, उत्तर प्रदेश की सरकार चली गयी. ढाँचा भी गिर गया, गोली भी नहीं चली और कल्याण सिंह की सरकार भी चली गयी.
सबने कहा कि अब इस मामले को सुलझाओ. सबने इसको हाई कोर्ट के जाने की बात कही. इस तरह यह मुकदमा हाई कोर्ट में आया. अब नरसिम्हा राव की सरकार ने उस छोटे से 14 हज़ार स्क्वायर फ़ीट के प्लॉट की रक्षा के लिए 90 एकड़ जमीन अक़्वायर कर ली. आप ध्यान दीजिए कि 14 हज़ार स्क्वायर फ़ीट 1/3 एकड़ होता होगा, 1/3 एकड़ से भी कम है 14 हज़ार स्क्वायर फ़ीट! वो सारी भूमि हिंदुओं की है. एक इंच भी मुसलमानों की ज़मीन एक्वायर नहीं की गई थी. उस 90 एकड़ की ज़मीन के चारो तरफ लोहे की दीवारें खड़ी कर दी गयी. जनता के दर्शन का रास्ता खोल दिया गया. आज तक लोग वहीं आते हैं. लाखों लोग आते हैं.
यह थी यहाँ तक की कहानी… अगली कड़ी में जानिए कि आखिर क्यों हिंदुओं को चाहिए पूरी ज़मीन?

5 Comments
वो राम की जन्मभूमि है ही नही न भारत का इतिहास वो है जो भारतीयों को पढ़ा दिया गया अपनी दुकानें चलवाने के लिए,अगर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनी थी तो ऐसे कई मंदिर है जो बोध मठो को तोड़कर बनाये गए है,लेकिन इतिहास कुछ और है।
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