राहुल की महत्वकांक्षा के लिए मध्यम वर्ग की जेब पर डकैती

लो भइया! ज़िल्ले- इलाही का फरमान आ गया. टैक्स तो सबको चुकाना होगा. छोटा हो या बड़ा, नाटा हो या लंबा, पतला हो या मोटा. देश के भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने अगर कह दिया, तो कह दिया.

आपने सैम पित्रोदा का नाम तो सुना ही होगा. अगर नहीं सुना होता तो ज़्यादा आश्चर्य होता क्योंकि देश की मीडिया की TRP की भूख इन्होंने ही मिटाई थी. शांति वाले कबूतरों की एक बड़ी खेप इनके द्वारा ही भेजी जाती है.

सुनने में आया है कि राहुल गांधी के करीबी भी हैं. अब इन्होंने देश के मध्यम वर्ग के लिए एक नया शिगूफा छोड़ा है जिसे सुनकर मध्यम वर्ग के होश उड़ जाएंगे.

भाई साहब ने एक इंटरव्यू में कहा है कि राहुल गांधी की महत्वकांक्षी योजना ‘NYAY’ की पूर्ति के लिए अब मध्यम वर्ग को अधिक टैक्स चुकाना होगा. उनका तर्क मध्यम वर्ग की रीढ़ की हड्डी पर सीधा प्रहार करता है. एक तो ऐसे ही मध्यम वर्ग का कंगाली में आटा गीला वाला हाल रहता है, दूसरी तरफ यह चाहते हैं कि इनके सियासी वादे को पूरा करने हेतु देश का मध्यम वर्ग जेब कटवा ले. भाई वाह!

राहुल गांधी के सियासी गुरु जी यही नहीं रुकते. उनका तो ये भी कहना है कि गरीबों के साथ न्याय के लिए मध्यम वर्ग को ये टैक्स देना ही होगा. मतलब ‘देना ही होगा’. बॉलीवुड की फिल्मों में हमने हफ्ता वसूलते देखा था. ये तो सीधे महीना वसूल रहे हैं.

समझ से बाहर है कि कांग्रेस पार्टी के नीति निर्माताओं को क्या हो गया है. 20% जनता को लाभ पहुंचाने के लिए 80% जनता की जेब काटना कहाँ का न्याय है? ऊपर से आप मध्यम वर्ग के पैसों से अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाएं पूरा करेंगे. गजब है साहब!

दूरी तरफ कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं कि इस योजना के लिए एक भी पैसा जनता से नहीं लिया जाएगा. टैक्स से नहीं लिया जाएगा. मतलब जनता को इतना कंफ्यूज़ कर दो कि वो सिर पकड़ के बैठ जाये. चुनाव जीतने के लिए इससे बड़ी राजनैतिक छटपटाहट हमने आज तक किसी पार्टी में नहीं देखी. जिस पार्टी में एक योजना को ले कर कांसेप्ट खुद क्लियर न हो, वो जनता को कहाँ से ‘न्याय’ देगी.

और तो और दो वरिष्ठ नेताओं की बातों में इतना बड़ा विरोधाभास बताता है कि चुनावी शोर के बीच में कांग्रेस अपनी आवाज़ नहीं दबने देना चाहती. दिक्कत ये है कि कोई सुन नहीं रहा तो वो चीख रही है. 72 हज़ार ले लो, 7200 करोड़ ले लो इत्यादि. यह भी एक गजब की ही स्थिति है जहां नेतृत्व होते हुए भी नहीं है.

लाल बहादुर शास्त्री और सरदार पटेल की राजनैतिक विरासत इस समय अवश्य लज्जित हो रही होगी ऐसा हाल देख कर. कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस ‘परिवार’ संकट में है.

अनिल अंबानी और मुकेश अंबानी से आपकी सियासी दुश्मनी समझ मे आती है, लेकिन मध्यम वर्ग से आपकी ये अप्रत्यक्ष दुश्मनी आपको सच में भारी पड़ेगी. यह न केवल समाज में फूट डालेगी बल्कि श्रम करने के मूल सिद्धांत पर प्रहार करेगी.

निश्चित रूप से गरीबों की गरीबी का सामाजिक उन्मूलन होना चाहिए, लेकिन मध्यम वर्ग की गाढ़ी कमाई के बदले यह न्यायसंगत नहीं है. जब देश की बड़े अर्थशास्त्रियों का मत है कि यह योजना यथार्थ के धरातल पर एक कोरा स्वप्न है, तो आप इसको मान क्यों नहीं लेते हैं. क्या दिक्कत हो रही.

चुनावी समय के तकाजे को हम जानते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि आप आंख बंद कर वादे फेंकते चले जाएं. कुछ तो लपेटे में भी नहीं आ रही हुजूर! अब ये मध्यम वर्ग तय करेगा कि उसकी जेब पर ये सियासी डकैती वो स्वीकार करेगा या नहीं, लेकिन चुनावों में दो फाड़ स्पष्ट हो गए. पलड़ा किसका भारी रहेगा ये देखने वाली बात होगा.

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