प्रकाश अंबेडकर के बिगड़े बोल

लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं लेकिन राजनीतिक दलों की बदजुबानी थमने का नाम नहीं ले रही है. हालात ऐसे हैं कि नेताओं द्वारा हर रोज़ एक नया शिगूफा छोड़ दिया जाता है. सभी पार्टियां इस चुनावी महासमर में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर वो कदम उठा रही है जिससे मतदाताओं को लुभाया जा सके.

सभी पार्टियों के नेता विरोधी नेताओं पर तो वार कर ही रहे हैं, वहीं तल्ख व अवांछित टिप्पणी करके चर्चा में भी बने रहना चाहते हैं. हालिया उदाहरण है प्रकाश अम्बेडकर का, जिन्होंने भाषण देते हुए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को भी नहीं छोड़ा.

प्रकाश अंबेडकर ने यवतमाल में कहा कि अगर वह सत्ता में आते हैं तो चुनाव आयोग को कम से कम दो दिन के लिए जेल भेजेंगे. उन्होंने चुनाव आयोग का हवाला देते हुए कहा कि वे कहते हैं पुलवामा पर बात नहीं करनी चाहिए, लेकिन हम इस मुद्दे पर बात करेंगे. हमें इसके लिए संविधान ने अधिकार दिया है.

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले की रैली में प्रकाश अंबेडकर के इस बयान पर संज्ञान लेते हुए राज्य चुनाव आयोग ने स्थानीय चुनाव अधिकारियों से मामले पर रिपोर्ट तैयार करने को कहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चुनाव आयोग ने प्रकाश अंबेडकर के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है.

गौरतलब है कि दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने कहा था कि उनका राजनीतिक मोर्चा महाराष्ट्र की सभी 48 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगा. उनके इस एलान से राज्य में कांग्रेस और राकांपा के भाजपा के खिलाफ ‘महागठबंधन’ बनाने की कोशिशों को झटका लगा था.

अंबेडकर ने कहा कि भाजपा विरोधी गठबंधन में शामिल होने के लिए कांग्रेस के साथ कोई बातचीत नहीं की जायेगी. उन्होंने कहा ‘कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने के लिए कई प्रस्ताव सामने आये लेकिन उसमें रोड़े आ गये. हम महाराष्ट्र में सभी 48 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे.

भारतीय संविधान का प्रारूप तैयार करने वाले डॉ.भीम राव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर भारतीय रिपब्लिकन पार्टी बहुजन महासंघ के संस्थापक भी हैं.

नेताओं द्वारा चुनाव पूर्व बयान बाजी, आरोप-प्रत्यारोप आम है, लेकिन संवैधानिक संस्था पर आरोप लगाना निश्चित ही घातक साबित हो सकता है. वर्तमान समय में नेताओं की भाषा शैली जिस प्रकार की हो गई है, उसे सुनकर जनता भी इनके चरित्र के विषय में आसानी से समझ जाती है. ये नेता आज अपनेे बिगड़े बोल से सुर्खियां तो जुटा सकते हैं, लेकिन वोट के लिए यह काफी नहीं होता है.

इस प्रकार की बयानबाजी से वोट बैंक का बड़ा हिस्सा दूसरी ओर स्थानांतरित हो सकता है, जिससे चुनाव परिणाम भी बदल जाते हैं. यहां महत्वपूर्ण यह है कि नेता अपने बयानों से स्वयं की छवि को खराब कर लेते हैं और फिर चुनाव परिणाम आने के बाद ईवीएम को दोषी ठहराते हैं. बहरहाल, देखना यह है कि चुनाव आयोग प्रकाश अंबेडकर पर आगे क्या कार्रवाई करता है.