देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री, भाजपा के वरिष्ठतम नेता और भारतीय राजनीति के पितृ पुरुष लालकृष्ण आडवाणी जी ने लगभग 5 वर्षों बाद ब्लॉग लिखा है. यह इस बात का भी संकेत है कि उम्र के दसवें दशक में भी लालकृष्ण आडवाणी स्वस्थ और सक्रिय हैं.
आज से 5 वर्ष पूर्व, जब आडवाणी जी नियमित ब्लॉग लिखते थे, तब राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को वहाँ बहुत कुछ सीखने और समझने को मिलता था. राजनीति के 7 दशक एक ही दल, एक ही विचारधारा और एक ही संगठन की छाया में बिता देने वाले, और उस दल, संगठन और विचारधारा के लिए स्वयं को खपा देने वाले लालकृष्ण आडवाणी ऐसे लोगों में से हैं जो अपनी बुद्धि, धैर्य, श्रम और चातुर्य से इतिहास बनाया करते हैं.
4 अप्रैल के ब्लॉगपोस्ट में आडवाणी जी ने जो लिखा है, उसका महत्व न केवल भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए है बल्कि राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाला प्रत्येक कार्यकर्ता और नेता उससे बहुत कुछ सीख सकता है और प्रेरणा प्राप्त कर सकता है.
अपने ब्लॉगपोस्ट में लालकृष्ण आडवाणी जी ने गाँधीनगर की जनता को धन्यवाद दिया है जिन्होंने उन्हे 6 बार चुनकर लोकसभा भेजा. लालकृष्ण आडवाणी ने संघ के साथ अपने सम्बन्धों को भी याद किया है जो अब 77 वर्ष पुराने हैं.
14 वर्ष की उम्र में कैसे एक किशोर टेनिस खेलते खेलते शाखा चला गया और फिर वहीं का होकर रह गया, यह एक अलग दिलचस्प कहानी है. आडवाणी ने भारतीय जनसंघ और बाद में फिर भारतीय जनता पार्टी से अपने सात दशक पुराने सम्बन्धों को भी याद किया है.
इसके अलावा आडवाणी जी ने उन मूल्यों की भी चर्चा की है जो भारतीय जनता पार्टी और उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ को ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बनाते रहे हैं. ‘पहले देश, फिर दल और फिर व्यक्ति’ यह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं का मूलमंत्र रहा है.
जनसंघ और भाजपा को भले ही अन्य दलों ने वर्षों तक अछूत माना लेकिन भाजपा ने कभी किसी दल को अछूत नही माना और न उनके लिए शत्रुता का भाव रखा है. यहाँ तक कि चीन-भारत युद्ध मे चीन का कथित रुप से समर्थन करने वाले कम्युनिस्ट पार्टियों को भी भाजपा ने कभी ‘राष्ट्रविरोधी’ दल कहकर संबोधित नही किया.
सत्य, राष्ट्र निष्ठा और दल के अंदर भी और देश मे भी लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता को उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का गाइडिंग प्रिंसिपल माना है. उन्होंने 1977 के आपातकाल के दौरान भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के संघर्ष को याद किया है. साथ ही, उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सुराज के सिद्धांतों के महत्व पर भी प्रकाश डाला है.
ऐसा लगता है कि सक्रिय राजनीति से सन्यास लेते हुए आडवाणी जी ने अपने कार्यकर्ताओं को उन मूल्यों को याद दिलाया है जिसके लिए डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ का गठन किया था. आडवाणी जी के ये विचार महत्वपूर्ण हैं और इनको ध्यान में रखा जाए तो सार्वजनिक जीवन की शुचिता बनी रह सकती है और लोकतंत्र और सुढ़ृढ़ हो सकता है.
बहुत कुछ सीखा जा सकता है आडवाणी जी से. यह ब्लॉग भी ऐसी ही अनेक सीख दे रहा है, आवश्यकता उन्हे आत्मसात करने की है. भारतीय राजनीति के वटवृक्ष आडवाणी अब संस्था स्वरुप हो गये हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी.
चिरकाल की नवज्योति हो
उत्कर्ष का आभास हो
कोई अलौकिक शक्ति हो
अभिव्यक्ति हो, विश्वास हो
मानो न मानो सत्य है
तुम स्वयं में इतिहास हो
