ये दाग अच्छे नहीं हैं

बड़ा बवाल हो रहा है सर्फ एक्सेल को लेकर. कहा जा रहा है कि यह लव जिहाद का एक प्रकार से प्रमोशन है. इस नश्वर संसार में अगर चिरकाल तक जीवित रहने वाला सोशल मीडिया न होता तो हम जैसे अज्ञानियों को पता भी नही चलता कि ऐसा कुछ हुआ भी है. वैसे भी जब से टीवी से मोह भंग हुआ, विज्ञापनों को भी हमारी तरफ से तीन तलाक दे दिया गया है.

सर्फ एक्सेल का विज्ञापन होली के एक दृश्य से शुरू होता है. छोटे बच्चे होली के गुब्बारे एक दूसरे पर मार रहे हैं. मोहल्ले के लोग उससे बचते हुए निकलते हैं कि तभी बीच में साईकल पर बैठी एक छोटी लड़की आती है और सब बच्चों को चुनौती देते हुए खुद पर रंग डालने के लिए कहती है. लड़कपन में बच्चे उसपर रंगों की बौछार शुरू कर देते हैं. वो सब झेल लेती है. उसके बाद वो एक घर के बाहर रुकती है और अपने एक दोस्त को आवाज़ देती है. घर से सफेद अचकन और टोपी लगाए एक छोटा लड़का निकलता है. वेशभूषा से कम से कम व्यक्ति के धर्म का पता तो चल ही जाता है. यहाँ पर सहसा आपको समझ में आ जाता है कि पूरा मामला क्या है. फिर वो उसको मस्जिद ले जाती है और वहाँ छोड़ देती है. जाते हुए जब वो उस लड़के से होली के बारे में पूछती है तो वह कहता है कि नमाज़ पढ़ कर आता हूँ.

इस पूरे मामले को देखने के बाद से वैसे तो बात साफ हो जाती है कि ये एक कंपनी का अपने सामान बिकवाने के लिए इमोशनल गुल्ली डंडा खेलने की एक तरकीब है. मगर इस तरकीब के साथ जो संदेश देने का प्रयास किया गया है, वह विचार के योग्य है.

एकता किसे नहीं पसंद? अरे हम तो वो हैं जिन्होंने एकता के लिए अपने भगवान के मंदिर बनाने हेतु भी 200 साल से इंतज़ार किया है और आज भी सर्वोच्च न्यायालय से उम्मीद लगाए बैठे हैं. बात यहाँ एकता की नहीं है. बात यहाँ एक सामाजिक संदेश देकर इमोशनल कार्ड खेलने के चक्कर में भावनाएं आहत करने की है. बहुत से लोगों को लग रहा होगा कि बच्चों के इस प्रेम में कैसे भावनाएं आहत हो जाती हैं. लेकिन उन्हीं लोगों के शब्दों में बताएं तो इन उदारवादी लोगों का ही मानना है कि यदि वंदे मातरम बजेगा, तो अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत होंगी. तो यहाँ तो पूरा का पूरा विज्ञापन है. आप कैसे उम्मीद लगा सकते हैं कि इस देश में लोगों की भावनाएं आहत नहीं होंगी.

इस विज्ञापन में एकता के पहलू के अलावा कुछ ऐसे पहलू भी हैं जिन पर लोगों का ध्यान गया. पहला तो यह कि जिस बच्चे को इस विज्ञापन में दिखाया गया, उसको रंगों से क्या परहेज़ था. चलिए ये तर्क स्वीकार्य है कि उसे अपनी पूजा पद्धति के लिए मस्जिद जाना था, लेकिन यदि विज्ञापन बनाने वालों ने दिमाग लगाया होता तो उसको नमाज़ पढ़ने के बाद होली खेलते हुए भी दिखा सकते थे.

एकता का संदेश तो यह भी होता न? इसके साथ ही ऐसे विज्ञापन में बच्चों एक इस्तेमाल करना भी प्रश्न उठाने वाला है. उन बच्चों के मस्तिष्क पर क्या असर पड़ेगा. वैसे कौन कैसा विज्ञापन बनाएगा इससे हमें कोई लेना देना नहीं है. हमारा यह कार्यक्षेत्र भी नहीं है, लेकिन जब बात दो धर्मों को लेकर एक त्यौहार के व्यापारिक इस्तेमाल की आ जाती है, तो सवाल उठाना बनता है. लाखों कंपनियों के प्रोडक्ट्स हमारे भारत में बिकते हैं, लेकिन सर्फ एक्सेल ने ही इस संवेदनशील मुद्दे को छुआ.

सर्फ एक्सेल इसके लिए बधाई का पात्र है कि कम से कम उसने एकता के विषय को चुनने की सोची, लेकिन उसका फाइनल प्रोडक्ट जब सामने आया, तो वह निश्चित रूप से निराश करने वाला था. यह पूर्णतया एकतरफा एकता का संदेश दे रहा था. ताली दोनों हाथ से बजती है. कम लिखा है, ज़्यादा समझिये.

देश के लोग इससे भली-भांति परिचित हैं कि जब व्यापारिक कारणों से एक विज्ञापन बनता है तो उसका एकमात्र लक्ष्य अपने प्रोडक्ट को बेचना होता है. इसीलिए कभी किसी ने ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ पर उंगली नहीं उठाई जबकि सबको पता है कि अपने देसी मट्ठे से बेहतर कुछ नहीं है. फिर भी, जनता ने इस पूरे व्यापार चक्र को स्वीकार कर लिया था, लेकिन जब ऐसे विज्ञापन सामने आएंगे तब सवाल भी पूछे जाएंगे और जवाब भी मांगे जाएंगे. सर्फ एक्सेल की तरफ से अभी तक कोई सफाई नहीं आई है क्योंकि उसके लिए पब्लिसिटी जबतक मिल रही है, तब तक ‘दाग अच्छे हैं’.

देखना ये है कि कब तक वो मैली अचकन को ढोते हैं. वैसे बॉयकॉट शुरू हो चुका है जिसके हम बहुत बड़े समर्थक नहीं हैं, लेकिन कौन किस प्रोडक्ट का इस्तेमाल करे, या न करे, इसको हम तय नहीं कर सकते हैं. हम तो हमेशा ऐसे मुद्दों पर सवाल उठाते रहेंगे. ज़िम्मेदार लोग जवाब दें, तो ठीक. और नहीं देंगे तो फिर हमारा जवाब तो समय पर  मिल ही जाता है. 



फोटो क्रेडिट

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

2 Comments

  1. Abhyuday
    March 12, 2019 - 4:35 am

    बिल्कुल सही कहा सर आपने इससे मैं पूरी तरह सहमत हूं

  2. अमित कुमार
    March 15, 2019 - 6:30 pm

    हिन्दुस्तान यूनिलीवर ने पहले भी गणेश पूजा और कुंभ पर विवादित विज्ञापन बना कर भारतीये लोगो की भावना को आहत किया है। इस कंपनी की आदत उस फिल्मनिर्माता की तरह हैं जो जानबूझकर संवेदनशील मुद्दे पर फिल्में बनाते है ताकि विवाद होने पर मुफ्त में प्रचार हो। हमें हिंदुस्तान यूनिलीवर के सभी उत्पाद का पूरी तरीके से वहिष्कार करना है, ताकि कोई भी इसप्रकार का विज्ञापन ना लाये। ऐसे आस्तीन के सांप वाले विज्ञापन का वास्तविकता प्रस्तुत करने के लिए मैं लोपक को धन्यवाद देता हूँ।

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