लड़ाई गजवा-ए-हिन्द की है, कश्मीर की नहीं

पाकिस्तान से जो लड़ाई हम लड़ रहे हैं, वह कश्मीर की लड़ाई नही है. पाकिस्तानी एस्टेब्लिशमेंट ने 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद ही कश्मीर को पाने की उम्मीद छोड़ दी थी. कोई और कसर बाकी रही हो तो 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के निर्णायक पराजय के बाद वह भी निकल गया. लेकिन इसके बाद भी वह अपने सीमित संसाधन कश्मीर में बर्बाद करता रहा है. हिन्दुस्तान के घाव को हरा रखने के लिए पाकिस्तान खुद भी घायल होता रहा है लेकिन पाकिस्तान ऐसा क्यों करता है, यह समझने में भारत अब तक असफल ही रहा है.

इसके पीछे दो कारण हैं. पहला तो यह कि इस्लाम और भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को लेकर जो भारत की समझ है, वह महत्मा गाँधी के माध्यम से है. गाँधी ने इस्लाम और भारतीय मुसलमानों को जिस नजरिये से देखा और समझा, वही भारत की सामूहिक समझ है. यह प्रमाणित हो चुका है कि इस्लाम को लेकर गाँधी की समझ में भारी खोट थी लेकिन. हमने अपनी समझ को इस मामले में बदला नहीं है. दूसरा यह कि हम पाकिस्तान को मोहम्मद अली जिन्ना के नजर से देखते हैं जबकि आज जो पाकिस्तान है, वह जिन्ना का पाकिस्तान है ही नहीं. यह तो जमात-ए-इस्लामी और मौलाना मौदूदी का पाकिस्तान है.

बेशक जिन्ना ने इस्लाम के नाम पर ही पाकिस्तान बनाया था लेकिन जिन्ना मजहबी कतई नही थे. उन्होंने अपनी राजनीति के लिए इस्लाम का इस्तेमाल किया था. हराम मानी जाने वाली मांस खाने वाले जिन्ना को ठीक से नमाज तक पढ़ने नही आती थी. फ़ारसी और अरबी से उनका कोई नाता नही था. वे कभी हज पर भी नहीं गए. उर्दू भी उतना ही बोल पाते थे जितना उत्तर भारत के नेता तमिलनाडु जाकर तमिल बोलते हैं.

जिन्ना दरअसल मुसलमानों के लिए मुल्क बनाना चाहते थे. लेकिन इस्लामिक मुल्क जो शरिया पर चले, वह जिन्ना का ख्वाब नही था. यह भी है कि किसी भी इस्लामिक मुल्क में जिन्ना को कुफ्र के कारण पत्थर मार कर कत्ल कर दिया जाता. जाहिर है जिन्ना के वश में होता तो पाकिस्तान वैसा न होता, जैसा आज है. लेकिन जिन्ना का पाकिस्तान कैसे जमात-ए-इस्लामी और मौलाना मौदूदी का पाकिस्तान बना यह भी एक दिलचस्प कहानी है.

सय्यद अबू आला मौदूदी चिश्ती सूफी फकीर मोईनुद्दीन चिश्ती के वंशज थे. अपने खानदान की वजह से भी उनकी मुस्लिम समुदाय में इज्जत थी. उर्दू, फारसी और अरबी खूब जानते थे. इस्लामिक इतिहास, कुरान और हदीथ के आलिम थे. जमात-ए-इस्लामी की स्थापना मौदूदी ने ही की. जमात-ए-इस्लामी लोकप्रिय भी हुई. लेकिन राजनीति में जिन्ना के सामने मौदूदी की दाल नही गली. जहाँ जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग राज्य की मांग कर रहे थे, वहीं मौदूदी और देवबंद के मौलाना मदनी इस्लामिक राज्य (हुकुमत-ए-इलाहिया) के सपने देख रहे थे. लेकिन मुस्लिम अवाम जिन्ना के ही साथ थी.

जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान में राजनीतिक सफलता तो खास नहीं मिली लेकिन पाकिस्तानी समाज, खास कर पंजाबी मुसलमानों  पर अपना असर छोड़ने में वे सफल रहे थे. पाकिस्तान बनाने में अहमदिया मुसलमानों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी. लेकिन यह  मौदूदी के हिंसक आन्दोलन का ही परिणाम था कि अहमदियों को पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया. 1953 के इस आन्दोलन में सैकड़ों अहमदी मुसलमान मारे गए थे. इस मामले में मौदूदी को फांसी की सजा भी हुई थी जिसे वहां की सरकार लागू नही कर सकी.  इसके बाद मौदूदी के इज्जत और रुतबे में बढ़ोतरी ही हुई.

अपने लेखों, किताबों, मदरसों और भाषणों के माध्यम से मौदूदी ने पाकिस्तान में पर्याप्त जहर भरे. लेकिन मौदूदी का बेहतरीन वक्त तो अभी आना शेष था. एक बड़ी भूमिका अब भी उनका इंतजार कर रही थी. 1977 में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी देकर जनरल जिया उल हक पाकिस्तान का सर्वेसर्वा बन बैठा. जिया उल हक को अपने शासन का औचित्य साबित करना था. इसके लिए उसने इस्लाम का सहारा लिया.  उसने मौलाना मौदूदी और दुसरे मुल्लों की तरफ हाथ बढाया. मौदूदी को एक उच्चाधिकार समिति का अध्यक्ष बनाया गया जिसके देख रेख में पाकिस्तान में इस्लामिक कानून लागू किये गये. पाकिस्तान में ब्याज पर बैन लग गया. जकात और उशर लागू कर दिया गया. मदरसों और वहाबी इस्लाम को बढ़ावा दिया गया. गाने और फिल्मों पर लगभग बैन लग गया. शरिया कोर्ट बनाये गये. औरतों और अल्पसंख्यकों के अधिकार बहुत कम कर दिए गये. गैर-मुसलमानों के लिए नफरत को संस्थागत बनाया गया. जमात-ए-इस्लामी के 500 मौलवियों को फ़ौज में इस्लाम सीखाने के लिए नौकरी भी दी गई. पाक फ़ौज में मजहबी कट्टरता फ़ैलाने में जामत ने बड़ी भूमिका अदा की.

गौर करें, आखिर मौदूदी मुसलमानों को किस रास्ते पर ले जाने चाहते थे. अपनी किताब ‘अल जिहाद फिल इस्लाम’ में वे लिखते हैं कि अल्लाह ने मुसलमानों को यह हुक्म दिया है कि वे दुनिया में किसी गैर-मुस्लिम की हुकुमत कायम नही रहने देंगे. वे कहते हैं कि गैर-मुस्लिमों को यह हक़ है कि वह इस्लाम स्वीकार करे या न करे. लेकिन उसे हक-ए-हुकुमत हासिल नही है. यही नही, हर मुसलमान का यह फर्ज है कि गैर-मुस्लिम की हुकुमत उखाड़ फेंके और उन पर जजिया कायम करे. 1977 के पहले जहाँ ऐसी तकरीरें मस्जिदों तक सीमित थी, अब वह मुख्यधारा का हिस्सा बन गई. फ़ौज से लेकर युवकों में ऐसी बातें भरी गई जिसके नतीजे में पाकिस्तान हमेशा के लिए बदल गया. 11 साल तक जनरल जिया का शासन रहा. इन 11 सालों में पाकिस्तान में जो बोया गया, उसकी फसल ही आज लहलहा रही है. इन्ही जहर भरी किताबों और ऐसी ही तकरीरों के जरिये पाकिस्तान के मदरसों में जिहाद की फसल तैयार की गई जो पहले सोवियत के खिलाफ अफ़ग़ानिस्तान में लड़ी और फिर भारतीय सेना के खिलाफ कश्मीर में लड़ रही है.

अब कश्मीर की लड़ाई, कश्मीर को पाने की लड़ाई नहीं है. अब वह इस्लाम की लड़ाई है, गजवा-ए-हिन्द की लड़ाई है. जीत-हार से परे, हिन्दूस्तान से ‘हिन्दू शासन’ मिटा कर शरिया लागू करने की लड़ाई है.  कश्मीर सिर्फ एक बहाना है. सीधे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान कश्मीर में जो कर रहा है या दिल्ली, मुम्बई और बनारस में जो करता रहा है,  वह ग़जवा ए हिन्द के लिए अपने हथियारों को धार देने का काम है. जब तक इस नए पाकिस्तान को, जो अब 40 साल पुराना हो चुका है, हम स्वीकार नही करेंगे, हम उससे लड़ नही सकेंगे. लड़ने के लिए शत्रु को जानना बहुत जरूरी है.

इसी सोच का नतीजा है कि पाकिस्तान ने अपने मिसाइलों के नाम ग़ज़नवी, ग़ौरी, बाबर और अब्दाली रखे हैं. आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि ये सभी नाम उन लुटेरों के नाम पर रखे गए हैं जो ग़जवा-ए-हिन्द का नारा लेकर हिंदुस्तान आये थे. पाकिस्तान इन मिसाइलों को उन बादशाहों का नाम भी दे सकता था जिन्होंने हिन्दुस्तान पर शासन किया. लेकिन उसने लुटेरों को चुना. यह चुनाव उस मानसिकता को दर्शाता है जिसे हम स्वीकार करने में शर्माते हैं क्योंकि वह इस्लाम और भारतीय मुसलमानों के गाँधी दर्शन से मेल नही खाता.

फोटो क्रेडिट

1 Comment

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