महाभारत को कुछ दिन ही रह गए हैं. दुर्योधन श्रीकृष्ण से सहायता माँगने द्वारका जा पहुँचा है. उधर जैसे ही पत्रकारों को ख़बर मिली उन्होंने ठान लिया कि ये श्रीकृष्ण तक पहुँचें उससे पहले इन्हें प्रेस कॉन्फ़्रेन्स करनी होगी.
दुर्योधन ने मन ही मन सोचा: “कर ले दुर्योधन प्रेस कॉन्फ़्रेन्स नहीं तो इन पत्रकारों का क्या भरोसा? अगर इन्होंने द्रौपदी चीरहरण की घटना को युद्ध के पहले उछाल दिया तो हमारी अपनी प्रजा में भी हमारे प्रति जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति है वो जाती रहेगी”
उसने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के लिए हाँ कर दी. कॉन्फ़्रेन्स शुरू हुई, सवाल दागे जाने लगे.
एक पत्रकार ने पूछा; “आपने श्रीकृष्ण की बहन द्रौपदी का अपमान किया. आपको कोई दुःख है?”
दुर्योधन बोला; “बात दुःख या सुख की नहीं है. बात है धर्म और अधर्म की. मेरा मानना है कि धर्म अधर्म से ऊपर होता है और सुख दुःख से ऊपर होता है. ऐसे में मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मैंने कभी भी सुख की बात नहीं की. आप पूछेंगे कि फिर मैंने कौन सी बात की? तो मैं कहूँगा कि मैंने हमेशा नारी सम्मान की बात की है.”
एक पत्रकार ने पूछा; “आपको क्या लगता है? द्रौपदी के घोर अपमान के पश्चात भी श्रीकृष्ण आपको युद्ध में मदद करेंगे?”
दुर्योधन बोला; “मैंने अपमान किया या नहीं यह जाँच का विषय है. धर्म के कुछ जानकार मानते हैं कि मैंने जो किया वह धर्म के विरुद्ध नहीं था. वहीं कुछ मानते हैं कि मैंने जो कुछ किया वह धर्म के विरुद्ध तो था परंतु अधर्म नहीं था. धर्माधिकारियों की एक और सभा मानती है कि मैंने जो किया वह धर्म के विरुद्ध भी था और अपने आप में अधर्म भी था. अब भ्रम की ऐसी स्थिति में जबतक जाँच आयोग न बैठेगा तबतक सत्य का पता लगना कदाचित सहज न होगा. मैं आपको वचन देता हूँ कि युद्ध समाप्ति के पश्चात मैं मामाश्री शकुनि, महामंत्री विदुर और अश्वत्थामा को लेकर तीन सदस्यीय आयोग का गठन करूँगा जो पता लगायेगा कि मैंने जो किया वह द्रौपदी का अपमान था या नहीं”
एक पत्रकार ने पूछा; “युवराज दुर्योधन, क्या आप बता सकते हैं कि …”
अचानक दुर्योधन ने उसे रोकते हुए कहा; “आप मुझे केवल दुर्योधन कहें. युवराज दुर्योधन न कहें”
एक महिला पत्रकार हठात् चिल्ला उठी; “ह्वाट अ ग्रेट मैन. अर्जुना शुड लर्न मॉडेस्टी फ्रोम हिम”
बाक़ी के पत्रकार उसे देखने लगे.
पत्रकार ने अपना प्रश्न दोहराया; “अच्छा चलें दुर्योधन कहता हूँ. मेरा प्रश्न यह है कि द्रौपदी जैसी सुकन्या का अपमान पुनः न हो इसके लिए क्या किया जा सकता है?”
दुर्योधन; “आपका प्रश्न महत्वपूर्ण है. देखिए मेरा मानना है कि कोई कन्या अगर सुकन्या न भी हो और अकन्या भी हो तो उसका अपमान नहीं होना चाहिए”
सारे पत्रकार अपने आभामंडल पर प्रश्नवंचक चिन्ह लगाए एक-दूसरे को देखने लगे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अकन्या क्या होता है. परंतु युवराज तो युवराज होता है. उसके ज्ञान को चुनौती देने की बात कौन सोचेगा?
कॉन्फ़्रेन्स आगे बढ़ी.
एक पत्रकार ने पूछा; “नारी अपमान का मूल कारण क्या हो सकता है?”
दुर्योधन ने एक लंबा पॉज़ मारा और बोला; “ देखिए मेरा ऐसा मानना है कि आपके क्षेत्र की तुलना में हमारे क्षेत्र यानी उत्तर भारत जैसे हस्तिनापुर, अवध, कुरुक्षेत्र वग़ैरह में पुरुष आवश्यकता से ज़्यादा अपराधी होते हैं.”
एक पत्रकार ने टोक दिया; “आवश्यकता से अधिक अपराधी से क्या तात्पर्य आपका? अपराधी होना क्यों आवश्यक है?”
ऐसे आउट ऑफ़ सिलबस प्रश्न सुनकर दुर्योधन सकपका गया. थोड़ा संभालते हुए बोला; “मेरा तात्पर्य था कि पुरुष के अंतर्मन में थोड़ा-बहुत तत्व का अपराध होता ही है”
एक पत्रकार बोला; “अच्छा आपके कहने का अर्थ है अपराध का तत्व. परंतु आपके जीजाश्री जयद्रथ तो उत्तर के नहीं हैं. वे तो सिंधु प्रदेश के राजा हैं. फिर भी उन्होंने द्रौपदी का अपहरण कर लिया था. ऐसे में आप कैसे कह सकते हैं कि …”
दुर्योधन; “मैं आपका प्रश्न समझ गया. देखिए, समस्या यह है कि हमने कभी भी समाज में नारी की स्थिति पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित नहीं की. इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहस और सेमिनार भी आयोजित नहीं किए. अगर हमने पहले से ये क़दम उठाए होते तो आज समाज में नारी की स्थिति उतनी बुरी नहीं होती. नारी सशक्तिकरण को एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनाकर हमें आगे बढ़ने की आवश्यकता है. मैं आपको वचन देता हूँ कि युद्ध समाप्ति के पश्चात जब हम विजयी होंगे तब हम नारी सशक्तिकरण के लिए एक आयोग बैठाएँगे जो यह सुझाव देगा कि नारी सम्मान को कैसे बढ़ाया जाय.”
एक पत्रकार ने पूछा; “फिर कोई किसी द्रौपदी को दाँव पर न लगा सके, उसके लिए क्या किया जा सकता है?”
दुर्योधन; “देखिए, मेरा मानना है कि केवल आपके इलाक़े यानी वेस्ट इंडियन ही अच्छे नहीं होते बल्कि दक्षिण के यानी साउथ इंडियन भी श्रेष्ठ पुरुष होते हैं. मैंने आचार्य पनियप्पन की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग गठित किया था जिसने यह सुझाव दिया है कि जुआ खेलते हुए यदि कोई अपना सबकुछ दाँवपर लगा हार जाए तो वह निर्बाध और खेल सके उसके लिए हम बैंकों से जुआ लोन की व्यवस्था कराएँगे. जुआ खेलने के लिए उचित ब्याज दर पर लोन मिलने का फ़ायदा यह होगा कि लोग अपनी पत्नी को दाँव पर न लगा सकेंगे. ऐसे में नारी का सम्मान बढ़ाया जा सकेगा”
इतना कहकर दुर्योधन ने अपने पर्सनल सेक्रेटेरी को देखकर आँख मारी और मुस्कुरा उठा।
एक पत्रकार ने पूछा; “आपने युद्ध की तैयारी कर ली है. क्या आपके पास योद्धाओं की….
तब तक दुर्योधन के सेक्रेटेरी ने उसे आँखों ही आँखों में कॉन्फ़्रेन्स समाप्त करने की सलाह दी। वह भगवान श्रीकृष्ण के महल की ओर चल पड़ा।

2 Comments
लाजवाब, अद्भुद,अप्रतिम….
उनको ऐसे भिंगो भिंगो का मारा है कि हमारी आत्मा ठण्डी हो गयी।
नमन इस लेखनी को