पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में भारत माँ के 40 से अधिक बेटे शहीद हो गए हैं. इस हमले के लिए विस्फोटक से भरी गाड़ी का इस्तेमाल किया गया जो कि सीआरपीएफ के काफिले में जा घुसी और सीआरपीएफ की बस को टक्कर मार दी, जिसकी वजह से विस्फोट हुआ व सैनिकों को शहादत देनी पड़ी. जब भी भारत में या विश्व में कहीं भी आतंकवादी हमला होता है उस हमले में आतंकवादी के रूप में जिसकी पहचान की जाती है वह इस्लाम से जुड़ा हुआ होता है.
हम भारतीय एकता में अनेकता की पहचान वाले व्यक्तित्व के हैं, व भाईचारे के प्रतीक के रूप में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का जाप करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि जिन्हें हम रहने के लिए घर दे रहे हैं या खाने के लिए भोजन दे रहे हैं, या हम जिन्हें अपना समझ रहे हैं, उन में से कई हमें अपना समझते ही नहीं हैं क्योंकि वो तो पाकिस्तान परस्त होते हैं, उन्हें अपने आकाओं के हुक्म के सिवा न तो कुछ दिखाई देता है और न ही समझ आता है।
संसद हमला हो या 26/11 या फिर उरी से पुलवामा तक आतंकियों के मददगार भारतीय ही रहे हैं, चाहे आतंकियों को पनाह देनी हो या फिर उन्हें अन्य किसी भी प्रकार की मदद करनी हो, और अब जबकि पुलवामा में 40 से अधिक सैनिकों को शहादत देनी पड़ी है, तब जिसका नाम सामने आ रहा है वह भी कश्मीर का ही रहने वाला है और मुस्लिम भी है.
पुलवामा में हुए आतंकी हमले के सरगना के रूप में जिसकी पहचान की गयी है वह आतंकी आदिल अहमद है जो पुलवामा के काकापुरा का रहने वाला है. पुलवामा की इस घटना का अंदेशा 2 दिन पहले पुलवामा जिले के ही एक निजी स्कूल में विस्फोटक (संभवतः आरडीएक्स) द्वारा हुए धमाके से ही हो जाना चाहिए था, साथ ही जाँच एजेंसियों को भी अलर्ट हो जाना चाहिए था, क्योंकि यह विस्फोट 10वीं कक्षा में हुआ था. दसवीं कक्षा के किसी छात्र के पास विस्फोटक सामग्री होना निश्चित ही सन्देहास्पद है, तथा उस छात्र का परिवार भी संदेह के घेरे में होना चाहिए था, क्योंकि पुलवामा की यह भयावह त्रासदी को भी विस्फोटक द्वारा ही अंजाम दिया गया है, जिसमें 3 किलो से अधिक विस्फोटक सामग्री का उपयोग किया गया है. इससे सीधा सवाल उठता है कि 3 किलो से अधिक विस्फोटक सामग्री कहाँ से आयी, कहीं इसमें पुलवामा के ही कुछ लोगों का हाँथ तो नहीं, क्योंकि लोकल सहयोग के बिना इतनी बड़ी घटना को अंजाम देना आसान नहीं था.
हम “हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आपस में हैं भाई-भाई” को चरितार्थ करते हैं, जबकि वो प्रत्येक क्षण घात लगाकर बैठते हैं मौका मिला और धोखा दो.
अब प्रश्न यह है कि कुछ भारतीय मुस्लिम पाकिस्तान परस्त क्यों हैं? जब इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने का प्रयास किया जाता है तो एक ही उत्तर होता है ‘आकाओं का हुक़्म’. और यह पूछने पर कि आकाओं का हुक़्म क्या है? तब उत्तर होता है – जिहाद.
जब प्रश्न यह हो कि जिहाद क्या है? तब उत्तर होता है ‘जिहाद का मतलब पाक मुस्लिम बनना है’. दरसअल कुरान की जिस आयत को प्रदर्शित किया जाता है, वह कुरान की आयत 8:37 होती है, जिसके अनुसार लड़ो जब तक कि फ़ितना (बुराई) खत्म न हो जाए, और तब तक लड़ो जब तक कि सिर्फ अल्लाह को मानने वाले बचें’
इसी प्रकार आयत 9:14 कहती है; “उनके खिलाफ लड़ो, तुम्हारे हाथों से ही अल्लाह उन्हें तबाह और लज्जित करेगा, उनके खिलाफ तुम्हारी मदद करेगा, और मुसलमानों की छातियों पर मरहम लगाएगा”. कुछ अन्य आयत भी ऐसी ही हैं, जैसे आयत 2:251 कहती है; “अगर अल्लाह लोगों के एक समूह द्वारा दूसरे समूह को रोकेगा नहीं, तो ये पृथ्वी तो शैतानों से ही भर जाएगी”.
हालाँकि सच यह है कि जिहाद का सीधा मतलब कोशिश करना है, लेकिन युवाओं को भड़काने व चरमपंथ को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान परस्त मौलानाओं द्वारा और भी कई आयतों का उल्लेख किया जाता है, जैसे आयत 2:256 कहती है; “धर्म में कोई मज़बूरी नहीं है”.
हालांकि जिहादी तर्क देते हैं कि यह आयत गैर मुसलमानों पर लागू होती है जिन्हें शरिया शासन के तहत रहना चाहिए. पाकिस्तान में रहने वाले एक बर्मी चरमपंथी मुफ्ती अबुजार अजाम का स्पष्टीकरण है कि इस आयत के अनुसार किसी भी ईसाई, यहूदी या गैर मुसलमान को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन उसकी दलील है कि जब मुसलमान जंग के लिए आगे बढ़ें तो उन्हें सबसे पहले दावा करना (यानी गैर मुसलमानों को इस्लाम में आने का न्यौता देना) चाहिए, अगर वे इसे कबूल नहीं करते हैं तो फिर लडाई शुरू होनी चाहिए.
अर्थात् मुसलमानों को भड़काने के लिए कुरान की उन आयतों का उपयोग किया जाता है, जिनमें ‘काफिरों को जीने का हक़ नहीं’ या इस तरह की अन्य बातों का ज़िक्र हो, और भारतीय मुस्लिम लड़के लड़ाके बनकर आसानी से हथियार उठाने के लिए तैयार हो जाते है.
यहाँ तक कि ये लड़ाके आत्मघाती हमलावर बनने के लिए भी तैयार हो जाते हैं, क्योंकि इन्हें सिर्फ और सिर्फ ज़िहाद का पाठ पढ़ाया जाता है, और स्पष्ट कहा जाता है “अल्लाह के लिए लड़ाई लड़ो अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा”.
सौ बात की एक बात यह है पाकिस्तान तो अपनी आदत से बाज़ आने वाला नहीं है, वह भारत विरोधी गतिविधियां करता रहेगा, लेकिन घर के भेदियों का क्या? जिस प्रकार से पृथ्वीराज के ख़िलाफ़ जयचंद ने मोहम्मद गौरी का समर्थन किया था, वैसे ही कुछ भारतीय मुस्लिम पाकिस्तान व राष्ट्र विरोधी ताकतों का समर्थन करते हैं, चाहे कारण जो भी हो, भड़का कर, धमकाकर या लालच देकर राष्ट्र के खिलाफ कार्य करना या कराना राष्ट्रद्रोह है, हुर्रियत नेताओं व अलगाववादी नेताओं ने हमेशा से ही भारत की ख़िलाफ़त की है. अतः अब समय आ गया है कि राष्ट्र विरोधी ताकतों व गतिविधियों पर लगाम लगायी जाए, तथा सैनिकों की शहादत का बदला लिया जाए.
(लेख में व्यक्त किए विचार लेख के निजी विचार हैं। आप उनको फेसबुक पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

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निश्चित ही भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या आज घर के भेदी हैं बखूबी राजनीति और धर्म के नाम पर अलगाववादी युवाओं का ब्रेन वाश करते हैं और ये युवा देश का विनाश करने पर लग जाते हैं, धर्म रूपी जहर का कहर आज भारत ही नहीं अपितु विश्व के लिए खतरा बना है। आज दुनिया आतंकवाद के उस मुहाने पर खड़ी जिससे अछूता कोई नहीं है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है देश के अंदर बैठे दुश्मन जो देश मे शांति और एकता को नष्ट करके अपना आधिपत्य स्थापित करने की चाह रखते हैं।