सेना तो युद्ध के लिए तैयार है पर क्या आप तैयार हैं?

देश के सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान के बाद से जो आक्रोध और शोक की लहर पूरे देश में देखने को मिल रही है, वह पाकिस्तान को भी अंदर से ज़रूर डरा रही होगी. इस पूरे आक्रोश के बीच एक स्वर युद्ध छेड़ने का भी उठाया जा रहा. कहा जा रहा है कि अब आर या पार! पाकिस्तान को नक्शे से खत्म करना है. उसको भी पता है कि ऐशो-आराम में मौज काट रहे उनके गीदड़ों का सामना जब हिन्द के शेरों से होगा, तो वह फिर शहर की तरफ भाग पड़ेंगे.

देश की इस आवाज़ और भावना का सम्मान होना चाहिए. यही किया भी जा रहा है. परंतु इस आवेग में बुद्धि को भी साथ ले कर चलना है. दुनिया को पता है कि पाकिस्तान की सेना भारतीय सेना के समक्ष हमेशा उन्नीस पड़ी है, और वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक कमज़ोरी इसकी सेना को भी साफ नजर आ रही है. इन्हीं सब बातों के बीच में युद्ध का विकल्प देने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि युद्ध सिर्फ दो देशों की सेनाओं के बीच नहीं होता अपितु उनकी जनता के बीच भी होता है. हमारे देश की जनता की भावनाओं का आदर करना चाहिए, लेकिन वह उन कठोर परिस्थितियों में जीवन यापन नहीं कर सकते हैं जिन परिस्थितियों में देश की सेना अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है.

युद्ध के समय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाली चोट हमें भी पड़ेगी. साथ ही हमारी जनता को बहुत सचेत हो कर रहना पड़ेगा. निश्चित रूप से जब सीमा पर युद्ध छिड़ा होगा तो भारत के सामाजिक ताने बाने की नाज़ुकता की भी कठिन परीक्षा होगी. अफ़ज़ल के चेले और ISI के गुर्गे देश के अंदर अराजकता फैलाने का पूर्ण प्रयास करेंगे. हमारे देश की भावनाएं कितनी जल्दी भड़कती हैं, इसका कोई उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है.

सोचिये कि जब आप एक घण्टा भी बिना बिजली और इंटरनेट के नहीं रह सकते हैं, तो युद्ध के समय तो यह सारी सुख सुविधाएं प्रभावित रहेंगी. पूर्व में देखें तो देशहित में बैंकों की लाइन में लगे लोगों की भावनाओं को भड़काने के पूर्ण प्रयास किये गए थे, और यहां तो हर सरकारी दफ्तर के आगे ही सैकड़ों लाइनें लगी होंगी. उस समय तो फिर भी पचास दिनों वाली एक सीमा रखी गयी थी, लेकिन यहाँ तो कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि कितना समय लगेगा. निश्चित रूप से तब दिनचर्या एकदम बदली होंगी. उन परिस्थितियों में क्या भारत का समाज संयम रख पाएगा? वो भी जब देश की राजनैतिक बिरादरी गिद्धों के समान वोटों की तलाश में किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रही होगी. देश के भविष्य को संभावनाओं के आधार पर नहीं छोड़ा जा सकता.

कठिनाइयां सिर्फ इतनी ही नहीं है. आज जहां इंसान का इंसान पर विश्वास नहीं रहा और मानवता सड़कों पर दम तोड़ रही है, उस नाज़ुक स्थिति में क्या गारंटी है कि समाज में फैले अराजक तत्व उत्पात नहीं मचाएंगे? और उस उत्पात के बीच आप क्या कर रहे होंगे? क्योंकि बचपन से आपको यही सिखाया गया है कि ‘अपने काम से काम रखो’. निश्चित रूप से अधिकतर लोगों ने अपने बच्चों को भी यही सिखाया होगा. 

सरकार जब निर्णय लेती है तो उसको समाज के हर वर्ग को ध्यान में रखना पड़ता है. युद्ध को इसीलिए ‘लास्ट रिसोर्ट’ कहा गया है. इसकी गंभीरता को आये दिन टीवी चैनलों पर रिटायर्ड जवान और पूर्व अधिकारी बताते रहते हैं. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि पाकिस्तान को जवाब नहीं दिया जाएगा. मज़बूत से मज़बूत पेड़ को गिराने के लिए उसकी जड़ पर प्रहार करना पड़ता है. पाकिस्तान की जड़ उसको मिल रही वैश्विक आर्थिक भीख है जिसके दम पर वो आतंकवाद निर्यात करता रहता है. उसी जड़ पर प्रहार करना है. दूसरी तरफ हमारे पास पाकिस्तान को प्यासा मारने के भी विकल्प खुले हुए है. शत्रु को हराने का मज़ा तब है जब उसको हर क्षेत्र में परास्त किया जाए.

इस आक्रोश और रक्त के उबाल को ठंडा नहीं होने देना है, लेकिन इसके साथ बुद्धि-विवेक और सही योजना की आवश्यकता है. हमें हमारी सेना पर पूरा भरोसा है. वह जानती है कि किसी देश को कैसे मुँहतोड़ जवाब देना है, लेकिन युद्ध की परिस्थितियों में देश की जनता के बीच जो विकट प्रश्न होंगे, वो सच में बहुत बड़े होंगे.

आक्रोश और प्रतिशोध के बीच संयम बनाये रखना है. प्रतिशोध तो लिया ही जायेगा, लेकिन सिर्फ बल से ही नहीं, बल्कि बुद्धि से भी इसका जवाब दिया जाएगा. सभी जिम्मेदार प्रबुद्ध लोग अभी भी बैठ कर यही उपाय ढूंढ रहे होंगे जिससे पाकिस्तान पर वज्रपात किया जा सके. आपके सीने में लगी आग की धधक सीमा पार निश्चित रूप से पहुंच रही है. आप बस अपना जज़्बा बनाये रखें और होश को जोश का पूरक बनाएं.

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