ये वो समय था जब नरेंद्र मोदी का दौर शुरू नहीं हुआ था. राजनीतिक चर्चाएं भी कांग्रेस और भाजपा के बीच इतनी बंटी हुई नहीं थी. इसी तरह की एक चर्चा में एक बुजुर्ग जिन्होंने आज़ादी के बाद सभी चुनावों में वोट डाला था, बड़े जोश के साथ बता रहे थे कि उन्होंने कभी कांग्रेस को वोट नहीं दिया. नेहरू से लेकर इंदिरा और फिर राजीव तक उनके अपने कारण थे. इसके कारण के रुप में उन्होने एक किस्सा सुनाया.
यह उनके एक जूनियर कर्मचारी और राजस्थान के एक बड़े कांग्रेसी नेता का 80 के दशक का वार्तालाप है. वह कर्मचारी नेता जी से अपने बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए मदद मांगने जाता है. काँग्रेस के नेता उसको न सिर्फ टरका देते हैं बल्कि एक ऐसा जवाब देते हैं जिसकी कल्पना उसने अपने जीवन मे कभी भी नहीं की थी. नेता जी उसे अपने पुत्र की पढ़ाई आगे न बढ़ाने का सुझाव दे रहे थे. उनका कहना था कि लड़का पढ़ाई करेगा तो शहर में चला जायेगा, जिससे माँ बाप से दूर हो जाएगा. गांव में रह कर खेती करेगा तो माँ बाप की सेवा करेगा. उस सज्जन के अनुसार यह नेता जी नहीं बल्कि कांग्रेस की विचारधारा बोल रही थी.
दशकों तक कांग्रेस गरीबी हटाओ का नारा देती रही परंतु गरीबी सिर्फ कांग्रेसियों की ही मिटी. तुष्टिकरण के साथ लोगों को अशिक्षित और गरीब रखने की नीति अपनाई गई ताकि वो सवाल न पूछे, विकास न मांगे और उनकी सत्ता अनवरत बनी रहे. ‘गवर्नेंस’ जैसा शब्द तो सोच से भी दूर रखा गया था. खैर, भारत में शिक्षा बढ़ी और इसी के साथ नए हालातों ने उदारीकरण को अनिवार्य बना दिया. कांग्रेस के पांव यही से उखड़ने शुरू हो गए.
इस तरह के अनेक किस्से हैं जिनकी प्रमाणिकता पर प्रश्न उठाया जा सकता है, पर पन्द्रह दिन पहले बनी राजस्थान की नई सरकार के पहले आदेश ने इस तरह की बातों की पुष्टि कर दी कि कांग्रेस की मानसिकता बदली नहीं है. नए आदेश में कांग्रेस के राजस्थान निर्वाचन अधिनियम के अंतर्गत होने वाले पंचायत और निगम चुनावों में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को समाप्त कर दिया गया है. पंचायत, नगर निगम और नगर पालिकाओ के चुनाव प्राइमरी गवर्नेंस के पहला पायदान होते हैं और आम जन जीवन में विधायक और सांसदों से ज़्यादा असर डालते हैं. 21वी सदी में जहाँ अशिक्षित नेतृत्व की बात सोची भी नहीं जा सकती है; वहां नई कांग्रेस सरकार का ये फैसला पुरानी घिसी पिटी नकारात्मक राजनीति को आगे बढ़ाया है. यह उसी जूनियर कर्मचारी की कहानी को दोहराएगा, मगर अलग तरीके से, अलग नेताओं द्वारा. कांग्रेसी सोच का यह उदाहरण अपने आप में ही बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.
सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत चुनावों में शैक्षणिक योग्यता रखने के लिए हरियाणा की भाजपा सरकार की प्रशंसा करते हुए इस फैसले को वैध ठहराया था. कांग्रेस की इस सोच का प्रदर्शन विगत 5 वर्षों में और अधिक देखने को मिला है. 60 साल से अमेठी और रायबरेली में गाँधी परिवार काबिज हैं पर वहाँ औसत विकास भी नहीं दिखता. सड़कों की दयनीय स्थिति तो सबको पता है. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता पृथ्वीराज चव्हाण सरकार बनने पर बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को खत्म करने की बात करते हैं. भारतीय रेल व्यवस्था के चेहरे को बदलने वाले इस प्रोजेक्ट से ले कर दिल्ली की लाइफलाइन कही जाने वाली मेट्रो रेल का भी कांग्रेस के साथी विरोध कर चुके हैं.
दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को फॉर्मलाइज़ और डिजिटल करने के प्रयासों का विरोध कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आज भी कर रहा है. जनधन खाता, रुपे कार्ड, भीम और UPI, आधार और DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) की सफलता एक तरफ जहाँ भारतीयों में बढ़ती जागरूकता और विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदमताल करने की ओर इशारा करते हैं, वहीं दूसरी ओर सभी रिपोर्ट्स और वैश्विक एजेंसी इन सभी माध्यमों से भारत द्वारा गरीबी उन्मूलन के सफल कार्यक्रमों के बेहतर प्रबंधन पर जोर देती हैं.
कुछ महीनों में विश्व अभी तक का सबसे बड़ा चुनाव देखेगा जहाँ 90 करोड़ मतदाता वोट कर भारत की नई सरकार चुनेंगे. कांग्रेस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन जो त्वरित मतदान और सटीक निर्णय के लिए विश्वविख्यात है, उस पर संशय उठा कर मतदान पर्चियों पर वापिस जाने की मांग कर भारत को 20 साल पीछे ले जाने पर आमादा है. सुदूरवर्ती इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने और बड़े व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को ले कर सुस्त/ उदासीन रवैया, पार्टी की दूरदर्शिता पर सवाल खड़े करता है.
अंत में यह प्रश्न आता है कि उसकी इस मानसिकता के मूल में क्या उद्देश्य है, जो उसे यथास्थितिवाद से नहीं उबरने देता. इसका एक उत्तर जो दिखता है, वो यह है कि जैसे इंदिरा गांधी के बाद प्रणव मुखर्जी जैसे अनुभवी व्यक्ति को दरकिनार कर उनके गैर राजनैतिक और प्रशासनिक रूप से अनुभवहीन पायलट पुत्र को बेरोक-टोक सत्ता हस्तांतरित कर दी गयी, वैसे ही आज 35 वर्ष बाद कांग्रेस पार्टी बिना किसी पूछताछ के 48 वर्षीय हाफ मैच्योर्ड राहुल गाँधी को देश के नेतृत्व के तौर पर थोपने की हिमाकत कर रही है. आगे भी वह इस व्यवस्था को जारी रखना चाहती है.
जैसा कि प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी लिखते हैं कि जब तक पक्षपात, दो मुंहापन, सस्ती आकांक्षा ; ढोंग और लालच कायम है, कांग्रेस फलती फूलती रहेगी. अब ये देश पर है कि वह कब तक इस तरह की नकारात्मक सोच को ज़िंदा रखेगा.
Image Credit
लेखक: आशुतोष चौहान
